धर्म ही एकमात्र शाश्वत सत्य, लक्ष्मी और यौवन सब अनित्य: पूज्या श्री प्रफुल्ला जी म.सा.

आयम्बिल तपोनिधि पूज्या श्री प्रफुल्ला जी म.सा. आदि ठाना ५ का रतलाम नगर में हुआ भव्य मंगल प्रवेश

​​

रतलाम 9 जुलाई। आयम्बिल तपोनिधि परम पूज्य श्री प्रफुल्ला जी म.सा. आदि ठाना ०५ का श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, नीमचौक के तत्वावधान में वर्षावास (चातुर्मास) हेतु रतलाम नगरी में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। इस पावन अवसर पर स्टेशन रोड स्थित जैन स्थानक में एक विशाल धर्मसभा का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में गुरुभक्तों और श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लेकर धर्मलाभ लिया।
​​धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्या श्री प्रफुल्ला जी म.सा. ने जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला। उन्होंने फरमाया कि: ​”यह जीवन क्षणिक है, पता नहीं कब कैसी घड़ी या समस्या सामने आ जाए। जब तक हमारी इंद्रियाँ मजबूत और सक्षम हैं, तभी हमें धर्म को अपना सच्चा साथी बना लेना चाहिए।”
​मन और धन की चंचलता को रेखांकित करते हुए महासती जी ने कहा कि मन बंदर की तरह लगातार दौड़ता और उछल-कूद करता रहता है। ‘चलम चित्तम चलम वित्तम’ के सिद्धांत को समझाते हुए उन्होंने ‘दौलत’ शब्द की सुंदर व्याख्या की:
​”दौलत दो शब्दों से बना है— ‘दो-लत’ (दो आदतें)। इसकी पहली आदत है कि ‘आवत ही अंधी करे’ अर्थात जब दौलत आती है तो इंसान अहंकार में अंधा हो जाता है। और दूसरी आदत ‘जावत करे मतिहीन’ अर्थात जब यह जाती है तो मनुष्य बुद्धिहीन हो जाता है।”
​उन्होंने आगे प्रेरणा दी कि संसार की बड़ी-बड़ी हवेलियाँ और राजमहल समय के साथ खंडहर बन जाते हैं, जहाँ आज चमगादड़ लटक रहे हैं। आयुष्य रूपी यह मंदिर चंचल है और यह पूरा संसार चलाचली का मेला है। इस अनित्य और अशाश्वत संसार में यदि कुछ नित्य और शाश्वत है, तो वह केवल धर्म है। जिसका मन धर्म में लग जाए, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं। उन्होंने सूक्ति दोहराई:
“धर्म बढ़ावे धन बढ़े, धन बढ़े तो मन बढ़े। धर्म घटाया धन घटे, धन घटे मन घट जाये।”
​महासती जी ने रतलाम को धर्म नगरी बताते हुए कहा कि मध्यप्रदेश और रतलाम शहर में उनका यह प्रथम आगमन है। उन्होंने श्रावकों से आह्वान किया कि इस चातुर्मास काल में अधिक से अधिक धर्म आराधना कर अपने कर्मों की निर्जरा करें। इस वर्षावास के दौरान सामूहिक सिद्धितप का विशेष आयोजन भी किया जाएगा।
​​धर्मसभा में पूज्या महासती द्विशतावधानी श्री महतीश्री जी म.सा. ने समय की महत्ता पर ज़ोर देते हुए ‘थ्री-एम’ (3M) का संदेश दिया— “मेजर योर टाइम, मैनेज योर टाइम एंड मेक योर टाइम” (Measure, Manage and Make your time)। उन्होंने कहा कि धर्म के लिए अपने समय का माप-तोल करें, उसे ठीक से मैनेज करें और द्रव्य रूपी नहीं बल्कि भाव रूपी धर्म के लिए अपने समय का सदुपयोग करें।
​​महासती जी ने संघ को अवगत कराया कि पूज्या महासती श्री प्रफुल्ला श्री जी म.सा. की ९८वीं ओलीजी आगामी २० जुलाई को पूर्ण होने जा रही है। इस अत्यंत कठिन और उग्र तप की अनुमोदना के स्वरूप आगामी २० जुलाई को रतलाम श्रीसंघ द्वारा सामूहिक आयम्बिल की विशेष आराधना का आयोजन किया जाएगा, जिसमें सभी जैन धर्मावलंबियों से अधिक से अधिक संख्या में जुड़कर तप आराधना करने की अपील की गई है। ​श्रावक संघ नीमचौक द्वारा गुरु भगवंतों के रतलाम आगमन पर हर्ष व्यक्त करते हुए चातुर्मास काल के विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों की रूपरेखा तैयार की जा रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Play sound