राम मंदिर चोरी का राजनीतिकरण अनुचित

  • प्रो. देवेन्द्र कुमार शर्मा
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राम मंदिर भारत की आस्था का प्रतीक है। वहां चोरी होने से सभी आस्थावान व्यथित है। प्रत्येक दर्शनार्थी राम मंदिर में अपनी आस्था, श्रद्धा और शक्ति के अनुसार भेंट चढ़ाता है। प्रतिदिन असंख्य भक्त भगवान राम के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस कारण वहां भेंट की राशि भी अपार होती है। राम मंदिर में हुई चोरी से सभी रामभक्त दुःखी है, खासकर इसलिए कि जिन व्यक्तियों को दान राशि को संभालने का दायित्व दिया गया था उन्होंने ही चोरी की। कानूनी कार्रवाई चल ही रही है किन्तु जिस तरह से चोरी की घटना का राजनीतिकरण किया जा रहा है वह बहुत अनुचित है। इस राजनीतिकरण का उद्देश्य राजनीतिक लाभ उठाना है। इस प्रयास से प्रत्येक रामभक्त का मन बहुत आहत है।
सर्वविदित है कि राम मंदिर में हो रही चोरी का मुद्दा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उठाया। चोरी की बात उजागर करना अनुचित नहीं है किन्तु उनके उद्देश्य की सराहना नही की जा सकती। राम मंदिर के प्रति उनकी श्रद्धा नहीं है यह सर्वविदित है। उनके पिता मुलायम सिंह यादव, तत्कालीन मुख्यमंत्री, ने बाबरी ढांचा गिराने वाले स्वयं सेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया था। राम मंदिर में चोरी की बात उजागर करने में उनकी रुचि राम के प्रति हिन्दू आस्था को चोट पहुंचाना ही है। फिर भी जो व्यक्ति राम मंदिर की व्यवस्था के प्रमुख कर्ताधर्ता रहे हैं वे अपने उत्तरदायित्व से बच नहीं सकते। दान की रकम की गणना करने वाले युवक बेरोकटोक रकम चोरी करते रहे किन्तु किसी ने उनकी गतिविधि पर ध्यान नही दिया। यह बहुत गैर जिम्मेदारी पूर्ण कार्य रहा है। चोरी करने वाले तो पकड़े ही गए किन्तु राम मंदिर ट्रस्ट के उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति अपने उत्तरदायित्व से नहीं बच सकते। अपने कर्तव्य की अनदेखी करने के लिए उनके विरूद्ध भी कार्रवाई होनी चाहिए। केवल पद से हटा देना ही समुचित कार्रवाई नहीं है।
किन्तु प्रश्न चोरी के काम का राजनीतिकरण है। शायद उनका उद्देश्य राम भक्ति में राम भक्तों की आस्था को कम करना है। यह अनुचित है। कहीं भी चोरी होना असामान्य बात नहीं है। बहुत कठोर सुरक्षा वाले स्थानों पर भी चोरी होती रहती है। चोरी एक कानूनी अपराध है। इस अपराध से कानून की दृष्टि से ही निपटा जाना चाहिए। इस अपराध का उपयोग राम भक्ति में आस्था कम करने के लिए उपयोग करना बहुत अनुचित प्रयास है। ऐसे प्रयास सफल होने वाले नही है। भगवान राम में सभी हिन्दुओं की आस्था दृढ़ और प्रगाढ़ है। इस आस्था को चोरी की कोई घटना कम नहीं कर सकती। हां दुःख प्रत्येक रामभक्त को है। दुःख इस बात का कि जिन युवाओं को दान की रकम गिनने का उत्तरदायित्व दिया गया था उन्होने ही चोरी की। उत्तरदायित्व राम मंदिर ट्रस्ट के प्रमुख कर्ताधर्ता का भी है जिन्होंने उचित सर्तकर्ता नहीं बरती फिर भी चोरी की घटना का राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास करना बहुत अनुचित है। इसकी जितनी भी आलोचना की जाए कम है।
दुःख इस बात का है कि राम मंदिर ट्रस्ट ने भक्तों के ट्रस्ट (विश्वास) के साथ लापरवाही की। कहने को तो मन हो रहा है कि भक्तों के साथ विश्वासघात किया। ट्रस्ट में लोगों का प्रवेश कैसे हुआ यह भी विचार करने का विषय है। कोषाध्यक्ष कभी कोष की तरफ ध्यान नहीं देते थे। केवल यह कहने से कि कोष के मामलों से उनका कोई संबंध नहीं रहा अपनी जवाबदारी से मुक्त नही हो सकते। अपने कर्त्तव्य का पालन न करना भी ट्रस्ट (विश्वास) का निर्वाह न करना ही होता है। ट्रस्ट के नियमानुसार सरकारी अधिकारियों को जांच करने का अधिकार होता है, उन्होंने भी ट्रस्ट में क्या चल रहा है इस पर ध्यान नहीं दिया। शायद सभी यह मानकर चल रहे थे कि कोई प्रभु राम के प्रति अपनी आस्था को धोखा नहीं दे सकता। वे यह भूल गए कि बेईमान का कोई धर्म नहीं होता। सरकार को चाहिए कि ट्रस्ट में बहुत ईमानदार और सख्त अधिकारी की प्रशासक के रूप में नियुक्ति की जाए। जिन्होंने अपने कर्त्तव्य का निर्वाह उचित ढंग से नहीं किया उनके विरूद्ध भी कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल यह कह देने से मेरा चोरी से कोई लेना-देना नहीं कोई अपने उत्तरदायित्व से बच नहीं सकता। जिन्होंने चोरी की उन्होंने राम भक्तों की आस्था को गहन आघात पहुंचाया है और जिन्होंने ध्यान नहीं दिया उन्होंने भी गंभीर अपराध किया है। फिर भी भगवान राम में हमारी आस्था अडिग है। चोरी के राजनीतिकरण का प्रयास सफल होने वाला नहीं।

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