
रतलाम 14 जुलाई। अमावस्या तिथि के पावन अवसर पर स्थानीय जैन समाज शांति नगर मे 24 तीर्थंकर प्रभु की स्तुति रूप ‘लोगस्स’ साधना का 27 बार सामूहिक जाप भक्तिभाव पूर्वक किया गया। इस अवसर पर पूज्य महासती प्रफुल्ला श्री जी मासा ने उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए तिथियों के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व पर गहरा प्रकाश डाला।
महासती जी ने फरमाया कि सामान्यतः लोग अमावस्या के नाम से डरते हैं और इसे अशुभ मानते हुए कोई भी शुभ कार्य करने से कतराते हैं। लेकिन वास्तव में कोई भी तिथि, दिन या समय बुरा नहीं होता। सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि हम प्रकृति से कैसे वाइब्रेशन्स (तरंगें) ग्रहण कर रहे हैं। यदि हमारी सोच और ऊर्जा सकारात्मक होगी, तो अमावस्या भी हमारे लिए बेहद शुभ और फलदायी तिथि सिद्ध होगी। महासती जी ने आगे कहा कि विज्ञान ने तिथियों के इस प्रभाव को बाद में स्वीकारा, जबकि जैन दर्शन तो अनादिकाल से ही इनके महत्व को मानता आ रहा है। पूर्णिमा और अमावस्या के दिनों में किए गए कार्यों में बढ़ोतरी होती है, इसलिए इन दिनों अधिक से अधिक धर्म-आराधना और जप करना चाहिए ताकि धर्म के प्रति हमारा रुझान सदैव बढ़ता रहे। बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों को इस दिन विशेष रूप से दान-पुण्य करना चाहिए, क्योंकि जरूरतमंदों की दुआओं के असर से असाध्य बीमारियां भी शांत हो जाती हैं। ’लोगस्स’ पाठ की महिमा बताते हुए महासती जी ने कहा कि यह तीर्थंकर प्रभु की दिव्य स्तुति है और इसका एक-एक शब्द महामंत्र है, जो जीवन बदलने की क्षमता रखता है।