

इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री ममं गुरु देव विशुद्ध सागर गुरवे नमः॥”__
गुरु की महिमा अगम है।
गुरु है ज्ञान का नीर।
गुरु के दर्शन मात्र से मिट जाती भव पीर ।
आषाढ़ माह की पूर्णिमा को पुरे भारत में गुरु पूर्णिमा के रूप में बड़े ही आनंद, उत्साह के साथ मनाया जाता है। राजेश जैन दद्दू ने कहा कि यह दिन केवल एक तिथि नहीं, अपितु हमारे जीवन में अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले धरती पर चलते फिरते गुरुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व है। गुरु पूर्णिमा।आओ जाने धरती पर चलते फिरते गुरुओ का महत्व ।
जैन धर्म में गुरु को “देव, शास्त्र, गुरु” में तीसरा स्थान प्राप्त है। गुरु ही हमें राग-द्वेष से मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं, समता, संयम और अहिंसा का पाठ पढ़ाते हैं। वे हमारे भीतर सोई हुई आत्मा को जगाते हैं और हमें मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं।
आचार्य, उपाध्याय और साधु – ये तीनों ही हमारे गुरु हैं। उनके आशीर्वाद, प्रवचन और आचरण से ही समाज में धर्म की प्रभावना होती है। चातुर्मास में जब मुनिसंघ एक स्थान पर विराजमान होकर धर्मदेशना देते हैं, तब गुरु पूर्णिमा का पर्व और भी पावन हो जाता है। आओ क्या करें इस दिन
- गुरु वंदन: गुरुदेव के दर्शन कर आशीर्वाद लें।
- स्वाध्याय: शास्त्रों का अध्ययन करें।
- दान-पुण्य: गुरु भक्ति में तप, जप, दान और सेवा करें।
- संकल्प: जीवन में संयम, सत्य और अहिंसा का संकल्प लें।
गुरु हमें बताते हैं कि जीवन का लक्ष्य केवल जीना नहीं, बल्कि “जानकर जीना” है। वे हमारे हाथ पकड़कर हमें संसार सागर से पार लगाते हैं।
इस गुरु पूर्णिमा पर आइए, हम सब अपने-अपने गुरुओं के प्रति हृदय से नतमस्तक हो कर आभार व्यक्त करें और उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को धन्य बनाएं।
गुरु बिना ज्ञान नहीं, ज्ञान बिना मुक्ति नहीं।
गुरु पूर्णिमा की सभी गुरु भक्ततो को हार्दिक शुभकामनाएं।