जैन समाज के सशक्त स्तम्भ: निर्मल सेठी का महाप्रयाण

डॉ मनीषा जैन

जैन समाज के दिग्गज एवं धर्मानुलमी, समाज का प्रबुद्धवर्ग भी वैश्विक महामारी कोरोना के कहर से अछूता नहीं रहा। मुनि-आर्यिका, ब्रम्हचारी आदि के साथ साथ धर्मनिष्ट श्री निर्मल कुमार सेठी भी इसके प्रकोप से बच नहीं सके।
श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के आधारस्तम्भ, जैन समाज के पितामह, विराट व्यक्तित्व के धनी, जैन संस्कृति के सम्पोषक, संरक्षक एवं तीर्थोद्धाकर निर्मल कुमार सेठी का महाप्रयाण होना सम्पूर्ण जैन समाज के लिए अपूरणीय क्षती है। 85 वर्ष की आयु में भी अपनी सकारात्मक कार्यशैली से युवाओं को मात देने वाले वयोवृद्ध युवा, कर्मनिष्ठ श्रावक का वैश्विक महामारी कोरोना के कहर से प्रभावित होने के कारण आकस्मिक निधन जैन समाज से ऐसे महान व्यक्तित्व का चला जाना बहुत दुःखद है। निर्मल जैन यथा नाम तथा गुण संज्ञा को सार्थक करते हुए अपने विचारों में सदैव निर्मलता रखने वाले श्रेष्ठ सरल स्वभावी व्यक्तित्व के रूप में पहचान रखने वाले श्रावक थे। विगत 40 वर्षों से आप श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रखते हुए आपने सम्पूर्ण जैन समाज, मुनि-आर्यिका, द्वादशांग जिनवाणी की सेवा सुश्रुषा की, तीर्थों का जीर्णोंद्धार आदि कराया तथा निःस्वार्थ सेवा से संगठन के समस्त शाखाओं के पदाधिकारियों को एकजुटता भ्राता तुल्य स्नेह रखा है।
श्रमण संस्कृति के उपासक: श्रमण संस्कृति के उपासक सम्माननीय निर्मलजी सेठी का संपूर्ण जीवन देव शास्त्र गुरु की आराधना, समाज, संस्कृति एवं चतुर्विध संघ के लिए समर्पित रहा। चतुर्विध संघ के आवागमन, आहार-विहार आदि में आप निःस्वार्थ सेवा करते रहे। आहार आदि की सभी व्यवस्थाओं का स्वयं निरीक्षण करते तथा नवधा भक्ति पूर्वक मुनि-आर्यिका आदि को आहारोपरान्त स्वयं आहार ग्रहण करते। आपका सम्पूर्ण जीवन साधु-संतों की सेवा- सुश्रुषा को ही समर्पित रहा।
प्राच्य विद्याओं के पोषक: आपने अपने जीवन काल में जैन दर्शन एवं प्राच्य विद्या के प्रचार-प्रसार एवं इसके पोषण में अग्रणीय भूमिका निभाते रहे। जैनविद्या एवं प्राकृत भाषाओं के संवर्धन के लिए विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित एवं प्रेरित करना उन्हें आर्थिक सहायता, छात्रवृत्ति प्रदान करना, कराना आपके लिए सुखद अनुभूति का अनुभव कराती थी। प्राच्यभाषा के मनीषी, श्रुत सेवकों आपके हृदय में बहुत बड़ा स्थान पाते थे तथा उन्हें उचित सम्मान दिलाना, प्रोत्साहित करना आप अपना कर्तव्य समझते थे। आपका स्वयं का स्वाध्याय एवं अनुसंधान परख ज्ञान एवं अनुभव के कारण सदैव विद्वतसमाज को प्रोत्साहित एवं सम्मान करते थे तथा उन्हें आदर भाव के साथ साहित्य लेखन आदि उत्कृष्ट कार्यों के लिए प्रेरित करते थे। आपके माध्यम से जैन धर्म, दर्शन एवं प्राच्य भाषा एवं साहित्य का प्रकाशन हेतु अभूतपूर्व योगदान रहता था। मां जिनवाणी के सच्चे सेवक के रूप में आप अग्रणीय पंक्ति में होते हुए श्रुत आराधना में तल्लीन रहते थे।
तीर्थों के संरक्षक, पुरातत्व के पुजारी: देश विदेश के हजारों तीर्थों को संरक्षण आपके पुरातात्विक समर्पण का ही परिणाम है। आज ऐसे हजारों तीर्थ क्षेत्र हैं जिसमें आपके माध्यम से किसी-न-किसी रूप में संरक्षण प्राप्त हुआ है, उनका जीर्णोंद्धार हुआ है। आपकी कर्मनिष्ठ और लगन के फलस्वरूप ही आज अनेकों तीर्थ जीवन्त है। सदैव ही तीर्थों के जीर्णोद्धार एवं पुरातत्वों के संरक्षण में आपने अपनी अग्रणी भूमिका निभायी है।
आपने पुरातात्विक वैभव एवं अनुसंधान के लिए विदेशों में अनेक यात्राऐं की तथा विद्वानों के द्वारा न केवल जैन पुरातात्विक वैभव की खोज की अपितु अनुसंधान के द्वारा विदेशों में जैन धर्म के होने का प्रमाण भी प्राप्त किया। विदेशों में जैन मूर्ती, अभिलेख एवं लिपी आदि के साक्ष्य जैन समाज के सामने प्रस्तुत किये। इसकी प्राचीनता जैन संस्कृति की धरोहर को हमारे सामने लाने वाले महान व्यक्तित्व के धनी समाज रत्न निर्मल जी सेठी थे। पुरातत्व के संरक्षण संवर्धन के लिए अनुसंधान कार्यों को किया एवं जैन दर्शन की अवशेषों को खोजने का सार्थक प्रयास अभी भी जारी था। आपने अपना सारा जीवन जैन धर्म के संरक्षण संवर्धन जिनवाणी की सुरक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
ऐसे महामना का देहावसान सम्पूर्ण जैन समाज के लिए अपूरणीय क्षती है। जिसकी भरवायी कर पाना मुश्किल है। किन्तु यदि हम उनकी कार्यशैली को अपने जीवन में अंगीकार कर लें, उनके गुणों को अपने जीवन में चरितार्थ कर ले, उनके अधूरे कार्यांे का पूर्ण करने का संकल्प ले तो यह उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
निदेशक-प्राच्यविद्या एवं जैन संस्कृति संरक्षण संस्थान
श्री दि. जैन मंदिर नसिया, जैन विश्व भारती रोड़त्र लाडनूं (राजस्थान) मो. 9828713013