धर्मसभा में महासती महती श्री म सा ने अनुशासन के तीन मुख्य स्तंभ बताए
रतलाम 5 अगस्त। नीमचौक जैन स्थानक में आयोजित धर्मसभा में महासाध्वी प्रफुल्ला श्री म.सा. एवं साध्वी महती श्री म.सा. के पावन सानिध्य में ज्ञान की अमोल गंगा बही। आज की धर्म सभा में मुख्य रूप से जैन सोशल ग्रुप रतलाम ग्रेटर परिवार के सदस्यगण धर्मलाभ लेने हेतु उपस्थित हुआ।
धर्म सभा को संबोधित करते हुए साध्वी श्री प्रफुल्ला श्रीजी म.सा. ने धर्म और श्रद्धा के गूढ़ अर्थ को स्पष्ट किया। उन्होंने फरमाया कि जो आत्मा को दुर्गति में जाने से बचाए, वही धर्म है। अहिंसा, संयम और तप में जिसका मन रम जाए, उसे धर्म कहते हैं। धर्मात्मा के पास देवता भी स्वयं आते हैं। तप और संयम की महिमा बताते हुए कहा: की खाने से शरीर का बल बढ़ता है, जबकि तप करने से आत्मबल बढ़ता है।
पंजाब के महान संत निहालचंद जी म.सा. ने कठोर अभिग्रह धारण किया था, जिसके कारण उन्होंने वर्षों तक केवल छाछ के पानी पर जीवन बिताया। उनके तप और निष्ठा के प्रभाव से जुड़ा चमत्कारिक प्रसंग आज भी संयम की पराकाष्ठा का अनुपम उदाहरण है। संसार कभी किसी का पूरा नहीं होता और अध्यात्म कभी अधूरा नहीं रहता। शादी-ब्याह या आयोजनों में हरी घास पर चलना अज्ञानता में असंख्य वनस्पति जीवों की हिंसा करना है। एक पेड़ उखाड़ना पूरे गांव को उजाड़ने के समान पाप है। मजबूरी में किया गया त्याग वास्तविक त्याग नहीं होता। दांत टूटने पर गन्ना छोड़ना या बीमारी होने पर मीठा छोड़ना त्याग नहीं है; समय रहते विवेकपूर्वक त्याग करना ही सच्चा धर्म है।
धर्मसभा मे साध्वी महती श्रीम.सा. ने अपने विचार व्यक्त करते हुए श्रद्धालुओं को जीवन में अनुशासन अपनाने की प्रेरणा दी। पिछले प्रवचन की B.A. (Blast Anger – क्रोध का नाश) की डिग्री का स्मरण कराते हुए उन्होंने आगे M.D. (Maintain Discipline – अनुशासन का पालन) की डिग्री हासिल करने का संदेश दिया। आपने अनुशासन के तीन मुख्य स्तंभ बताए। 1 माता-पिता का अनुशासन: यह दीपक के ऊपर कांच के कवर की तरह है, जो जीवन रूपी लौ को भटकने और बुझने से बचाता है। 2. गुरु का अनुशासन: संत जीवन में 5 महाव्रत और श्रावक जीवन में 12 व्रतों का अनुशासन ही मोक्ष मार्ग की ओर ले जाता है। और 3. धर्म का अनुशासन: जीवन को नियमबद्ध बनाएं। परिवार में कम से कम एक समय साथ बैठकर भोजन करें, प्रति रविवार परिवारजन आपस में मिलें। साथ ही नवकारसी, स्वाध्याय, सामायिक और प्रतिक्रमण जैसे धार्मिक नियमों को दैनिक जीवन में शामिल करें।