जीवन की हर परीक्षा आत्मविकास का अवसर, तृष्णा त्यागे बिना सफल नहीं होता संन्यास : आचार्य विशोकानंद भारती

अखंड ज्ञान आश्रम के दिव्य चातुर्मास महोत्सव में कठोपनिषद स्वाध्याय एवं श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन, धर्म रक्षा और आत्मचिंतन का दिया संदेश

रतलाम। स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत शुक्रवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय तथा सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। दोनों ही सत्रों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
प्रातःकालीन प्रवचन में आचार्य महामंडलेश्वर विशोकानंद जी भारती ने कहा कि जैसे विद्यार्थी को वर्षभर अध्ययन के बाद परीक्षा देनी पड़ती है, उसी प्रकार जीवन भी निरंतर परीक्षाओं से भरा हुआ है। गुरु द्रोणाचार्य द्वारा अर्जुन एवं कौरवों की परीक्षा का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि सफलता उसी को मिलती है, जिसका लक्ष्य स्पष्ट और एकाग्र होता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में मोबाइल का अत्यधिक उपयोग एकाग्रता का सबसे बड़ा बाधक बन गया है। प्रवचन सुनते समय यदि मन मोबाइल में उलझा रहेगा तो ज्ञान आत्मसात नहीं हो पाएगा।
आचार्यश्री ने कहा कि संन्यास तभी सफल होता है, जब मनुष्य तृष्णाओं का त्याग कर देता है। उन्होंने विशेष रूप से लोक-तृष्णा, वित्त-तृष्णा तथा अन्य सांसारिक तृष्णाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि संन्यास ग्रहण करते समय गंगा एवं गुरु को साक्षी मानकर साधक यह संकल्प लेता है कि वह समस्त तृष्णाओं का त्याग कर साधना के मार्ग पर चलेगा। यदि व्यक्ति केवल वस्त्र बदल ले और मन की इच्छाओं का त्याग न करे तो उसका संन्यास केवल बाहरी रूप तक सीमित रह जाता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि वर्षों से आश्रम में आने के बाद भी यदि जीवन में परिवर्तन नहीं आया तो साधना अधूरी है। साधना का उद्देश्य ऐसी योग्यता प्राप्त करना है, जिससे असंभव भी संभव प्रतीत होने लगे। उन्होंने उतृष्णा एवं वितृष्णा का विस्तार से विवेचन करते हुए कहा कि धन की लालसा साधु के लिए पतन का कारण बनती है, जबकि समाज, संत एवं गौसेवा के लिए किया गया संग्रह सेवा का माध्यम बनता है।
सायंकाल आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में आचार्यश्री ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का अवतार धर्म की रक्षा, सज्जनों के संरक्षण तथा दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाश के लिए हुआ। उन्होंने कहा कि धर्म की स्थापना के लिए समय-समय पर ईश्वर अवतार लेते हैं।
उन्होंने धर्म के चार चरणों का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रत्येक युग में अधर्म ने धर्म को चुनौती दी, लेकिन अंततः धर्म की ही विजय हुई। श्रद्धालुओं से उन्होंने कहा कि कथा केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए होती है। यदि भागवत को हृदय से ग्रहण किया जाए तो वह मनुष्य को पापकर्मों से दूर कर आत्मकल्याण का मार्ग दिखाती है।
आचार्यश्री ने रावण प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि अहंकार और कुल-मर्यादा का विनाश मनुष्य को जीवित रहते हुए भी मृतक के समान बना देता है। इसलिए धर्म, मर्यादा और सदाचार का पालन ही जीवन की वास्तविक सफलता है।
संध्या आरती में गोस्वामी समाज जिला अध्यक्ष विनोद गिरि, भंवर गिरी प्रकाश गिरि, निरंजन गिरी,विक्रम गिरि, सुरेंद्र गिरि, संजय पुरी,भंवर गिरि, कमल गिरि, दीपक गिरि, कैलाश भारती, शिवगिरि, यशवंत पर्वत,मनोहर पुरी, अर्पित भारती, वाघेला गोसेवा जीवदया समिति के दिनेश वाघेला, अंतर्राष्ट्रीय हिंदू परिषद एवं राष्ट्रीय बजरंग दल मालवा प्रांत संगठन के संजय यादव, संदेश पापटवाल, नितेश सोलंकी, लखन सिंह सहित आश्रम के संतगण तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिला-पुरुष उपस्थित रहे।
स्वामी देव स्वरूपानंद जी ने धर्म सभा में आने वाले श्रद्धालुओं से अपील की है कि वह अपना मोबाइल बंद रखें अन्यथा मोबाइल काउंटर पर जमा करें प्रवचन के पश्चात उन्हें मोबाइल पुनः वापस दे दिया जाएगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *