नचिकेता ने स्वर्ग के सुख को भी ठुकराया, गुरु से मन का मिलन ही सच्चे संन्यास का प्रारंभ : चातुर्मास महोत्सव में आध्यात्मिक प्रवचन

रतलाम, 11 अगस्त । स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत मंगलवार को निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। दोनों आयोजनों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
जीव अविनाशी है, शरीर नश्वर
प्रातः कालीन प्रवचन में स्वामी विशोकानंद जी भारती ने कहा कि मनुष्य विषयों के आकर्षण में फंसकर अपनी दुर्गति कर रहा है। जीव ने स्वयं को केवल जीवात्मा मान लिया है, जबकि वास्तविकता यह है कि जीव बंधन में है और आत्मा सदैव मुक्त है। जीव अविनाशी है। वह शरीर के साथ नष्ट नहीं होता। जाग्रत अवस्था में वह स्थूल शरीर के साथ रहता है, जबकि स्वप्न अवस्था में स्थूल शरीर का साथ छोड़कर सूक्ष्म रूप में अनुभव करता है और पुनः लौट आता है।
उन्होंने स्फटिक का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार स्फटिक के पास रखी धूल स्फटिक में प्रवेश नहीं करती, केवल उसके संपर्क में दिखाई देती है और हटाते ही अलग हो जाती है, उसी प्रकार ईश्वर का अंश अविनाशी जीव भी उपाधियों से वास्तविक रूप से बंधा नहीं है। उपाधियों का हटना ही आत्मस्वरूप की पहचान है।
नचिकेता ने स्वर्ग को भी नहीं माना अंतिम लक्ष्य
स्वामी जी ने कठोपनिषद के नचिकेता प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि नचिकेता ने मृत्यु के रहस्य को जानने के लिए यमराज से प्रश्न किया। यमराज ने उसे सांसारिक सुख और स्वर्ग के प्रलोभन दिए, लेकिन नचिकेता ने यह समझ लिया था कि स्वर्ग भी स्थायी नहीं है। इसलिए उसने क्षणिक सुखों को अस्वीकार कर उस ज्ञान की मांग की, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से पार ले जाए।
उन्होंने कहा कि आज हमारे पास जो कुछ है, वह पहले हमारे पास नहीं था। वह आया है और एक दिन चला भी जाएगा। यह आवागमन की सृष्टि है। इसलिए मनुष्य को नश्वर वस्तुओं के मोह से ऊपर उठकर परम सत्य की ओर बढ़ना चाहिए।
इंद्रिय विजय के बिना आध्यात्मिक उन्नति कठिन
आचार्य श्री ने कहा कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए मनुष्य का इन्द्रियजित होना आवश्यक है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन को कर्म, संयम और आत्मज्ञान का मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि जैसे विद्यालय का शिक्षक परीक्षा लिए बिना किसी विद्यार्थी को आगे नहीं बढ़ाता, उसी प्रकार सृष्टि का विधान भी मनुष्य को परीक्षा और अनुभवों के माध्यम से परिपक्व करता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को शास्त्रों का अध्ययन करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जीवन में विपरीत परिस्थिति आने पर शास्त्र ही मनुष्य को सही मार्ग दिखाते हैं।
अर्जुन के संयम का प्रसंग सुनाया
प्रवचन में अर्जुन और उर्वशी का प्रसंग सुनाते हुए स्वामी जी ने बताया कि स्वर्ग में उर्वशी के समक्ष आने पर भी अर्जुन ने उसे माता के समान सम्मान दिया। अर्जुन ने कहा कि वह उसे अपनी माता कुंती के समान मानता है। अर्जुन के इस संयम और ब्रह्मचर्य के कारण उसका चरित्र और दृढ़ हुआ। उर्वशी ने क्रोधित होकर उसे श्राप दिया, लेकिन यही प्रसंग आगे चलकर अर्जुन के लिए एक विशेष परिस्थिति में उपयोगी सिद्ध हुआ।
स्वामी जी ने कहा कि रावण का तेज भी सीता हरण के बाद धीरे-धीरे क्षीण हुआ। मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति संयम और ब्रह्मचर्य से पुष्ट होती है। उन्होंने कहा कि साधना के मार्ग पर बाहरी आडंबर से अधिक आवश्यक आंतरिक शुद्धता, संयम और निष्ठा है।
गुरु से मन का मिलन ही सच्चे संन्यास की शुरुआत
सायंकालीन श्रीमद्भागवत कथा में स्वामी विशोकानंद जी भारती ने गुरु-भक्ति का महत्व बताते हुए कहा कि यदि मनुष्य गुरु का नहीं हुआ तो केवल तीर्थाटन करने से उसे वास्तविक लाभ प्राप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा कि केवल पुजारी बनना पर्याप्त नहीं है, मनुष्य को सच्चा भक्त बनना होगा।
कबीर के वचन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा— “मैं कहता हूं आंखन देखी, तू कहता है कानन सुनी।” उन्होंने समझाया कि जब पत्नी का मन पति से मिल जाता है, तभी गृहस्थ जीवन की वास्तविक शुरुआत होती है। जब शिष्य का मन गुरु से मिल जाता है, तब संन्यास का प्रारंभ होता है और जब भक्त का मन भगवान से मिल जाता है, तब वास्तविक भक्ति और आत्मसमर्पण की अवस्था आती है।
अक्रूर-कृष्ण प्रसंग ने बांधा श्रद्धालुओं को
श्रीमद्भागवत कथा में अक्रूर जी के भगवान श्रीकृष्ण से मिलन तथा उन्हें कंस के पास ले जाने के प्रसंग का विस्तृत वर्णन किया गया। कथा के माध्यम से भगवान के प्रति समर्पण, भक्ति और धर्म के मार्ग पर चलने का संदेश दिया गया।
स्वामी जी ने कहा कि केवल कथा सुनना पर्याप्त नहीं है। कथा के संदेश को जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है। धुंधकारी के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने श्रद्धालुओं को समझाया कि मनुष्य को अपने जीवन में परिवर्तन लाने के लिए कथा के मर्म को आत्मसात करना चाहिए।
60 वर्ष से अधिक उम्र वालों से संन्यास के लिए किया आह्वान
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती ने 60 वर्ष से अधिक आयु के श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि यदि वे अब संन्यास के लिए तैयार हों तो वे उन्हें संन्यास मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि जीवन के इस पड़ाव पर मनुष्य को सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठकर आत्मकल्याण और परमात्मा की प्राप्ति के लिए जीवन समर्पित करने का प्रयास करना चाहिए।
कार्यक्रम में स्वामी जी का स्वागत एवं सम्मान कन्हैयालाल मौर्या, सुरेश पापटवाल सहित अन्य भक्तजनों ने आरती से पूर्व किया। आरती के पश्चात घासीराम स्वीट्स की ओर से श्रद्धालुओं को प्रसादी वितरित की गई।

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