
कविता – संजय एम. तराणेकर
नदी की धारा में फिर निर्मलता हो,
हर बूंद में जीवन की संभावना हो।
जहरीले मैल से “मुक्त” हो किनारा,
हरियाली से सजे नदी का नज़ारा।
नदियाँ सिर्फ नदी नहीं, पहचान है,
गाँवों की धड़कन, इसकी जान है।
इसके आँचल में इतिहास बसा है,
लहरों में शहर का विश्वास बसा है।
आओ मिलकर ऐसा “संकल्प” करें,
नदी को फिर से निर्मल-स्वच्छ करें।
नहीं कोई कचरा, न गंदगी का भार,
नदी बहे निर्बाध एवं रहे जल अपार।
नदियाँ बारहों मास जल से भरी रहे,
हर लहर इसकी जीवन से जुड़ी रहे।
यहाँ मछलियाँ लौटें व लौटे हरियाली,
किनारों पे गूँजे प्रकृति की खुशहाली।
यहाँ विकास हो मगर प्रकृति के साथ,
नदियों के हित में उठाइये हरेक हाथ।
प्यारी नदियाँ बचेंगी “कल” मुस्काएगा,
घाटों का अपना “गौरव” लौट आएगा।
संजय एम. तराणेकर,
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर-452011 (मध्यप्रदेश)
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