रतलाम,26 अगस्त। शिव को मानने वाले शैव, विष्णु को मानने वाले वैष्णव और जिन को मानने वाले जिन-जैन होते है। इतिहास को जानना है, तो तीर्थकर का चरित्र पढो। दुनिया का ज्ञान कभी नहीं होगा, इसलिए धर्म से जुडो। धर्म और इतिहास का ज्ञान तत्व ज्ञान से होगा।
यह बात मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने कही। मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि आत्मा का ज्ञान करने वाला साधक होता है। उसे राग-द्वेष दोनो छोडना पडते है। तत्व को जो नहीं समझता, वह माथा-कूट करता रहता है और जो तत्व को समझ लेता है, वो सबकुछ छोडकर आत्मा में आ जाता है। भगवान को याद कर उनके गुणों का चिंतन करते हुए हम उनके जैसे बन सकते है। इसलिए तीर्थंकर का चरित्र पढना आवश्यक है।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि मन स्थिर होने वाला नहीं है। इसे सिर्फ मोडा जाता है। लोग पतंग उडाते है, उसे नचाते है, फिर वह जैसे स्थिर होती है, वैसे ही मन भी होता है। पतंग की तरह मन को भी नचाया जाता है और फिर स्वाध्याय के बल से वह स्थिर होता है। मन को नियंत्रित कर भगवान के चरित्र को आत्मसात करने का प्रयास किया जाता है, तो भक्ति में सफलता निश्चित मिलती है।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि साधना में शरीर से ज्यादा मन को तपाना पडता है। योग और कषायों से कर्मों का बंध होता है, तो उसे तोडने के लिए जप-तप आदि साधना की जाती है। कर्म प्रबल पुरूषार्थ से निर्झरित होते है। कठोर साधना से कर्मों को नष्ट करने के लिए मानसिक पुरूषार्थ ज्यादा जरूरी है, क्योंकि अधिकांश कर्म मन से ही बंधते है। मन को स्थिर करने के लिए किया गया पुरूषार्थ सदैव परिणाम दायक होता है।
प्रवचन के आरंभ में उपप्रर्वतनी, महासती, प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ने संबोधित किया। उनके साथ ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी मसा एवं सेवाभावी श्री कल्पनाजी मसा, एवं श्री दर्शनमुनिजी मसा मंचासीन रहे। प्रवचन के दौरान श्री धर्मदास जैन श्री संघ सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे। संचालन रखब चत्तर एंव आयुष गंग द्वारा किया गया।