जहां साधु-संतों का चातुर्मास नहीं, वहां धर्म की ध्वजा थाम रहे जावरा के युवा

  • श्री वर्धमान स्वाध्याई संघ के 60 से अधिक युवा देशभर में बने स्वाध्यायी, पर्यूषण पर्व में करवा रहे धर्म आराधना
  • आठ दिनों तक पंच महाव्रत की भावना के साथ साधु-संतों जैसी संयमित दिनचर्या अपनाकर कर रहे धर्म प्रभावना

जावरा (अभय सुराणा) । जैन धर्म में ज्ञान, स्वाध्याय, संयम और धार्मिक प्रशिक्षण का विशेष महत्व है। इसी भावना को साकार करते हुए श्री वर्धमान स्वाध्याई संघ जावरा पिछले कई वर्षों से धर्म प्रभावना के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य कर रहा है। इस वर्ष संघ के 60 से अधिक युवा देश के विभिन्न शहरों में चल रहे पर्यूषण पर्व में स्वाध्यायी के रूप में पहुंचकर समाजजनों को धार्मिक क्रियाएं, स्वाध्याय, आराधना एवं विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधियां करवा रहे हैं।
संघ के संस्थापक नरेंद्र मेहता ने बताया कि वर्ष 1993 से श्री वर्धमान स्वाध्याई संघ द्वारा ऐसे स्थानों पर, जहां साधु-संतों का चातुर्मास नहीं हो पाता है, संबंधित श्री संघ के आग्रह एवं आमंत्रण पर युवाओं की स्वाध्यायी टीमें भेजी जाती हैं। सामान्यतः प्रत्येक प्रोजेक्ट टीम में दो से चार युवा होते हैं, जो पर्यूषण पर्व के दौरान समाज के बीच रहकर धार्मिक क्रियाएं एवं विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधियां संपन्न करवाते हैं।

160 से अधिक युवा संगठन से जुड़े
श्री वर्धमान स्वाध्याई संघ से वर्तमान में विभिन्न शहरों से 160 से अधिक युवा जुड़े हुए हैं। संगठन का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करवाना नहीं, बल्कि युवाओं में धर्म के प्रति आस्था, अनुशासन, स्वाध्याय, नेतृत्व क्षमता और सेवा भावना विकसित करना भी है।
इस वर्ष संघ के युवा पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश के विभिन्न शहरों में स्वाध्यायी के रूप में पहुंचकर पर्यूषण पर्व की आराधना करवा रहे हैं। संघ के वरिष्ठ स्वाध्यायी भावेश राजकुमार हरण के साथ ओजस सुराणा एवं रक्षित कोचर की टोली राजस्थान के बारा शहर में पहुंची हुई है, जहां वे पूरी तन्मयता एवं समर्पण के साथ जैन धार्मिक प्रशिक्षण एवं पर्यूषण पर्व की विभिन्न क्रियाएं करवा रहे हैं।
बारा में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों के दौरान राजस्थान सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रमोद जैन भाया एवं जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती उर्मिला जैन भाया सहित श्रीसंघ के पदाधिकारियों की भी उपस्थिति रही। भगवान के जन्म वाचन समारोह के अवसर पर उनकी सहभागिता से कार्यक्रम में विशेष धार्मिक वातावरण बना।

आठ दिनों तक साधु-संतों जैसी संयमित दिनचर्या
संघ के सचिव दर्शन मारू ने बताया कि स्वाध्यायी बनकर जाने वाले युवाओं के लिए यह केवल किसी धार्मिक आयोजन में सहभागिता नहीं, बल्कि आत्मअनुशासन, संयम और धर्म साधना का विशेष प्रशिक्षण भी है। पर्यूषण पर्व के आठ दिनों तक ये युवा अपनी दिनचर्या को अत्यंत संयमित रखते हुए साधु-संतों के जीवन से प्रेरणा लेते हैं तथा पंच महाव्रत की भावना के अनुरूप धार्मिक जीवन जीने का प्रयास करते हैं।
स्वाध्यायी युवक स्वयं भी नियमित स्वाध्याय, ग्रंथ वाचन एवं धार्मिक आराधना करते हैं और समाज के लोगों को भी धार्मिक क्रियाओं में सहभागी बनाते हैं। भक्ति, धार्मिक प्रवचन, शास्त्र वाचन, प्रश्नोत्तरी एवं विभिन्न धार्मिक प्रतियोगिताओं के माध्यम से बच्चों, युवाओं एवं समाज के अन्य सदस्यों को धर्म से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।

प्रतिभा और रुचि के अनुसार निभाते हैं जिम्मेदारी
संघ के अध्यक्ष विनीत मेहता ने बताया कि स्वाध्यायी संघ की विशेषता यह है कि प्रत्येक युवक को उसकी रुचि, योग्यता एवं प्रतिभा के अनुसार जिम्मेदारी दी जाती है। कोई धार्मिक क्रियाएं करवाता है, तो कोई ग्रंथ वाचन, भक्ति, बच्चों की गतिविधियां, धार्मिक प्रतियोगिताएं अथवा अन्य व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभालता है।
इस प्रकार पर्यूषण पर्व युवाओं के लिए केवल धर्म आराधना का अवसर नहीं रहता, बल्कि उनके व्यक्तित्व विकास, नेतृत्व क्षमता, अनुशासन और सेवा भावना को निखारने का माध्यम भी बन जाता है।

धर्म आराधना के साथ नवयुवकों को संस्कारों से जोड़ना उद्देश्य
मनीष कोचर एवं विनोद दख ने बताया कि संघ का प्रमुख उद्देश्य ऐसे स्थानों पर पहुंचकर धर्म आराधना करवाना है, जहां साधु भगवंतों का चातुर्मास नहीं होता। इसके साथ ही अधिक से अधिक नवयुवकों को धर्म के प्रति जागृत करना तथा उन्हें जैन संस्कारों, सिद्धांतों और धार्मिक परंपराओं से जोड़ना संगठन की प्रमुख प्राथमिकता है।
संघ का मानना है कि यदि युवावस्था में धर्म, संयम और स्वाध्याय के संस्कार मजबूत किए जाएं तो यही युवा भविष्य में समाज और धर्म की जिम्मेदारियों को प्रभावी ढंग से संभाल सकते हैं।

स्वाध्यायियों के साथ माता-पिता का भी होता है बहुमान
संघ के सचिव दर्शन मारू ने बताया कि पर्यूषण पर्व की समाप्ति के बाद सभी स्वाध्यायी युवक अपने-अपने स्थानों पर लौट आते हैं। इसके बाद अनुकूल तिथि देखकर किसी तीर्थ स्थान पर सभी स्वाध्यायियों का सामूहिक बहुमान एवं मैत्री मिलन समारोह आयोजित किया जाता है।
संस्था के पूर्व राष्ट्रीय सचिव भावेश राजकुमार हरण ने बताया कि इस आयोजन में स्वाध्यायियों के माता-पिता का भी विशेष बहुमान किया जाता है। युवाओं को धर्म कार्य के लिए बाहर भेजने में माता-पिता की सहमति, सहयोग और प्रोत्साहन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए स्वाध्यायियों के साथ उनके माता-पिता का सम्मान करना भी संघ अपनी जिम्मेदारी मानता है।

अभ्युदयपुरम में होगा स्वाध्यायियों का बहुमान
इस वर्ष अभ्युदयपुरम स्थित श्री कल्याण मंदिर नवग्रह महातीर्थ पर सभी स्वाध्यायियों का बहुमान एवं मैत्री मिलन समारोह आयोजित किया जाएगा।
श्री वर्धमान स्वाध्याई संघ का यह प्रयास इस बात का उदाहरण है कि जब युवाओं को धर्म का प्रशिक्षण, संस्कार और सेवा का अवसर मिलता है, तो वे साधु-संतों की अनुपस्थिति वाले स्थानों पर भी धर्म आराधना और प्रभावना की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी पूरी श्रद्धा एवं अनुशासन के साथ निभा सकते हैं। युवाओं में धर्म के संस्कार जितने मजबूत होंगे, उतनी ही मजबूती से जैन धर्म की परंपराएं, सिद्धांत और मूल्य आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचेंगे।

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