
इंदौर। श्रावक संस्कार शिविर के छठे दिन उत्तम संयम धर्म की व्याख्या करते हुए मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने कहा कि संयम केवल बड़े त्याग का नाम नहीं, बल्कि जीवन के हर कार्य को मर्यादा और सीमा में करने की साधना है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि कौन सा कार्य कहाँ, कब और किस सीमा में करना है। घर में भोजन, पूजा, अध्ययन और विश्राम के लिए स्थान निर्धारित होना चाहिए। जूते-चप्पल पहनना गलत नहीं, पर उनकी भी सीमा तय हो। मंदिर, घर और अन्य स्थानों की अपनी मर्यादा होती है – यह क्षेत्र का संयम है।
काल का संयम जरूरी –
महाराज जी ने कहा कि केवल स्थान ही नहीं, समय का संयम भी आवश्यक है। पूजा, अभिषेक, सामायिक और स्वाध्याय के लिए निर्धारित समय का पालन करने से जीवन में अनुशासन आता है और परिवार में शांति बनती है।
प्रत्येक व्यक्ति का संयम उसकी अवस्था और जिम्मेदारी के अनुसार अलग होता है। जैन श्रावक को अपनी धार्मिक मर्यादाओं का पालन करते हुए दूसरों से तुलना नहीं करनी चाहिए। उन्होंने रात्रि भोजन और व्यसनों से बचने तथा जैन आहार परंपरा बनाए रखने का संदेश दिया।
मनुष्य जन्म दुर्लभ है –
महाराज श्री ने कहा कि भोग-विलास तो अनेक योनियों में संभव है, लेकिन संयम, साधना और आत्मकल्याण की दिशा में बढ़ने का अवसर केवल मनुष्य पर्याय में मिलता है। इसलिए मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो अन्य योनियों में संभव नहीं।
घर-परिवार में रहते हुए भी छोटे-छोटे नियमों से संयम की शुरुआत की जा सकती है। “मनुष्य जन्म केवल धन कमाने और भोग के लिए नहीं, आत्मकल्याण और संयम के लिए मिला है।”
धर्मसभा में चक्रवर्ती मनीष सपना गोधा नवीन आनंद गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन डॉ जैनेन्द्र जैन हुकुम काका विजय धुर्रा अरविंद अखिलेश सोधीया सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित थे।