“मैं इसके किस काम आ सकता हूँ” – यही धर्म का सच्चा भाव है : मुनिश्री

इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । दलालबाग स्थित विद्या सुधा देशना मंडप में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य मुनिश्री 108 सुधासागर जी महाराज ने कहा कि केवल धार्मिक क्रियाएँ करना ही धर्म नहीं है, बल्कि उनके पीछे सच्चा भाव होना आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि पद या क्रिया से कोई व्यक्ति उसका सच्चा अधिकारी नहीं बन जाता। दान देने वाला हर व्यक्ति दानी, पूजा करने वाला भक्त या व्रत रखने वाला सच्चा साधक हो, यह आवश्यक नहीं। पिता होना और पिता का दायित्व निभाना, गुरु को मानना और उनकी आज्ञा को जीवन में उतारना – ये अलग-अलग बातें हैं। उन्होंने कहा कि हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि हमारे संबंध वास्तव में सच्चे हैं या स्वार्थ पर आधारित। धर्म हमें यह सिखाता है कि हम केवल यह न सोचें कि “यह मेरे किस काम आएगा?”, बल्कि यह विचार करें कि “मैं इसके किस काम आ सकता हूँ?”
सूखे पौधे का उदाहरण देते हुए महाराजश्री ने कहा कि एक व्यक्ति पौधे की सेवा भविष्य में फल पाने के लिए करता है, जबकि दूसरा उसे बचाने और जीवन देने के भाव से पानी देता है। यही अंतर स्वार्थ और सेवा का है।
उन्होंने कहा कि जल, अग्नि और पृथ्वी निरंतर हमारी सेवा करते हैं। हमें भी उनके प्रति जिम्मेदारी समझनी चाहिए। मिट्टी से मंदिर, कलश और भगवान का आसन बन सकता है। दृष्टि बदलते ही वही वस्तु अशुभ से मंगल बन जाती है।
हर संबंध को व्यापार मत बनाइए
मुनिश्री ने कहा कि आज मनुष्य ने संबंधों को भी लेन-देन बना दिया है – “तुम मेरे काम आओ, मैं तुम्हारे काम आऊँगा।” यह प्रेम नहीं, व्यापार है। श्रीराम का भाव था – “माता-पिता मेरे लिए नहीं, मैं माता-पिता के लिए हूँ।” यही भावना गुरु, माता-पिता, पति-पत्नी और समाज के सभी संबंधों में होनी चाहिए। “तुम मेरे काम आओ या न आओ, मैं तुम्हारे काम आऊँगा” – यह प्रेम है।
उन्होंने कहा कि जब यह भाव जीवन में आता है, तब स्वार्थ सेवा में बदल जाता है और सामान्य जीवन भी धर्ममय हो जाता है। उन्होंने समाजजनों से अपने भावों का आत्म-परीक्षण कर प्रत्येक संबंध में लेने के बजाय देने की भावना विकसित करने का आह्वान किया। धर्मसभा में सपना गोधा, मनीष गोधा, आनंद गोधा, नवीन गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, प्रिंसपाल जी टोंग्या, संजय जी पाटोदी, राहुल सेठी, डॉ जैनेंद्र जैन सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।