
निमियाघाट/कोडरमा । अहिंसा संस्कार पदयात्रा के प्रणेता साधना महोदधि भारत गौरव उभय मासोपासी आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज निमियाघाट के सहस्त्र वर्ष पुरानी भगवान पारसनाथ की वरदानी छांव तले विश्व हितांकर विघ्न हरण चिंतामणि पारसनाथ जिनेंद्र महाअर्चना महोत्सव पर भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए।
अंतर्मना प्रसन्नसागरजी ने कहा- हर दुख में से छोटा-मोटा सुख खोज लो अगर एक आदमी आया —जिसकी एक आंख है तो तुम सोचना कि मेरी तो दो आंखें हैं यह सोचकर प्रभु को धन्यवाद देना कि प्रभु तूने मुझे इतना दिया जितनी मेरी पात्रता नहीं थी ।
किसी के पैरों में बढिय़ा किस्म के जूते चप्पल देखकर यह दुख मत करना कि मेरे पांव में बढिय़ा जूते और चप्पल नहीं है अपितु किसी लंगड़े व्यक्ति को देखकर नाचने लग जाना और प्रभु से कहना कि हे प्रभु तू बड़ा दयालु है तूने मुझे दो पेर दिए जिन से मैं चल सकता हूं दौड़ सकता हूं।
प्रभु से कभी यह शिकायत मत करना कि तूने मुझे कुछ नहीं दिया परमात्मा के प्रति कृतज्ञ बनकर जीना लेकिन तुम बड़े बेईमान हो तुम मंदिर जा रहे हो और रास्ते में तुम्हें चोट लग गई तो तुम परमात्मा को ही कोसने लगते हो की है भगवान तेरे ही मंदिर को आ रहा था और तूने ही पांव तोड़ दिया ऐसा मत कहना अपितु पाव टूटे तो भी इसे प्रभु का प्रसाद मान लेना सोचना पाव ही तो टूटा है जीवन तो नहीं छूटा
वरन इतनी बड़ी दुर्घटना में भी क्या कोई जिंदा बचता है तू जो मिले उसे प्रभु का प्रसाद मानकर स्वीकार कर लेना लेकिन आदमी बड़ा बेईमान है प्रशंसा की मिठाई को तो प्रसाद मान कर खा लेता है लेकिन गाली का गोबर उसे पसंद नहीं आता
आचार्य प्रसन्नसागरजी महाराज ने कहा- जीवन में दुख आ जाए तो उसे प्रभु का प्रसाद समझकर स्वीकार कर लेना क्योंकि दुख तुम्हारे निमंत्रण पर ही आया है जब व्यक्ति कोई पाप कोई गलत काम करता है तो वह दुख को निमंत्रण ही देता है पाप करना ही दुख को निमंत्रण देना है आज यदि जीवन में दुख है तो समझना तुमने कभी ना कभी उसे निमंत्रण देना है आज यदि जीवन में दुख है तो समझना तुमने कभी ना कभी उसे निमंत्रण दिया था दुख तुम्हारे ही द्वारा किए गए अशुभ कर्मों का फल है तुम अपने दुख के लिए स्वयं जिम्मेदार हो लेकिन तुम बड़े बेईमान हो जब तुम पर कोई दुख आता है तो तुम दुख का कारण दूसरों को ठहरा देते हैं की पत्नी के कारण दुखी हूं दुख के लिए तुम हमेशा ही दूसरों को जिम्मेदार ठहरा देते हो और जब तुम सुखी होते हो तो कहते हो कि मैं अपने कारण से सुखी हूं मेरे सुख में मेरी खुशी में मैं ही कारण हूं यह तुम्हारी जो आदत है यह ठीक नहीं है यह दोहरा चरित्र दोगली जीवनशैली ठीक नहीं है भगवान महावीर ने कहा है कि मनुष्य अपने कृत्य कर्मों का फल स्वयं भोक्ता है कोई किसी को ना तो सुख देता है और ना ही दुख हम सब अपने ही पुण्य पाप का फल भोंकते हैं इस फल में निमित्त तो कोई भी बन सकता है लेकिन उपादान तो तुम स्वयं ही होगे । दुख के मूल में तुम्हारा ही अशुभ कर्म होगा । उक्त जानकारी कोडरमा मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा, नवीन जैन ने दी ।