रतलाम 10 अक्टूबर। भगवान महावीर के जितने भी अनुयायी है, चाहे वे किसी भी संप्रदाय से जुडे हो और उनकी धार्मिक क्रियाओं में कितना ही अंतर क्यों ना हो, किसी को किसी की अवहेलना अथवा निंदा नहीं करना चाहिए। धर्म हमेशा जोडना सिखाता है। किसी को बांटता नहीं है। इसमें राग-द्वेष से मुक्त होना सिखाया जाता है, उसे बढाना नहीं है।
यह प्रेरक संदेश मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य, रत्नपुरी के रत्न, श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने दिया। मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान की वाणी को सुनना ही नहीं समझना भी जरूरी है। इसे समझने पर जीवन मे ंपरिवर्तन आता है। इससे जीवन की दशा बदल जाती है। जीवन तभी बदलता है, जब विचारों की सोच निर्मल हो और विचारों में बदलाव हो। अंदर से जीवन बदले, तो समझ लेेना मोक्ष करीब है।
उन्होंने कहा कि धर्म का यही मूल तत्व है कि मनुष्य को जो व्यवहार अपने लिए अच्छा नहीं लगता, उसे दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए। विडंबना है कि आजकल धर्म की वे क्रियाए जो मात्र धर्म में सहायक होती है, उन पर अधिक जोर दिया जाता हैं। इससे व्यक्ति अपने संप्रदाय से जुडे बंधनों में बंधकर राग और द्वेष जैसे दोषों को जन्म दे रहा हैं। प्रवर्तकश्री ने कहा कि सिर्फ हमारे गुरू द्वारा प्रतिपादित धर्म ही सही और सच्चा है, ये एकांतवाद का सिद्धांत है। इससे मोहनीय कर्म बंधते है और मान कषाय भी होता है।
धर्मसभा को प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ने भी संबोधित किया। संचालन आयुष गंग ने किया। इस दौरान सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी मसा, प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ठाणा-8, महासती श्री चंदनबालाजी मसा, महासती श्री कल्पनाजी मसा मंचासीन रहे। धर्मसभा में श्री धर्मदास जैन श्री संघ के सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण उपस्थित रहे।