पूज्य गुरु माँ गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी -जैन संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और विश्व शान्ति की अमर प्रेरणा स्त्रोत

शरद पूर्णिमा पर विशेष लेख

जैन संस्कृति अनादि निधन और सबसे प्राचीन संस्कृति है। जैन धर्म और भारतीय संस्कृति में कुछ ऐसी महान विभूतियां हैं, जिनका जीवन स्वंय एक ग्रन्य बन जाता है। जिनका तप, त्याग, साधना, चिन्तन और सृजन आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक दीप बन जाता है। परम पूज्य गणिनी प्रमुख, आर्यिका शिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी ऐसा ही एक विलक्षण व्यक्तित्व हैं जो जैन संस्कृति की अमर ज्योति हैं। जिन्होंने अपने दीर्घ संयमित जीवन का आत्म कल्याण के साथ-साथ जैन धर्म, जैन संस्कृति, प्राचीन तीर्थों के संरक्षण, तीर्थकर जन्म भूमियों का विकास, शिक्षा, स्वाध्याय, अहिंसा और विश्व शान्ति का संदेश के लिए समर्पित कर दिया।
हस्तिनापुर से जैन संस्कृति के नवजागरण की हुई शुरुआत परमपूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानपती माताजी ने हस्तिनापुर (मेरठ) को अपनी कर्मभूमि बनाकर जैन संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन की ऐतिहासिक आधारशिला रखी। हस्तिनापुर भगवान कुयुनाथ, शांतिनाथ और अरहनाथ तीन तीर्थकरों की पावन जन्म भूमि है। माताजी की प्रेरणा से यहाँ श्री दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान की स्थापना हुई और इसी पावन भूमि पर जम्बूद्वीप रचना की अदभुत कृति का निर्माण हुआ जिसने जैन भूगोल, दर्शन व आध्यात्मिक चिंतन को जनमानस तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
जम्बूद्वीप केवल एक आध्यात्यिक रचना नहीं बल्कि जैन दर्शन और ब्रह्मांड विज्ञान की सजीव प्रस्तुति बनकर विश्वभर के श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बना। जम्बूद्वीप, हस्तिनापुर से ही प्रारम्भ हुई गुरु-माँ की विकास की यात्रा। 550 से अधिक ग्रन्थों का अनुपम साहित्य सृजन पूज्य माताजी का जैन संस्कृति पर चिन्तन बढ़ता ही गया, उन्होंने सर्वप्रथम साहित्य सृजन को अपनाया, सबसे बड़ी विशेषताओं में पूज्य माताजी का अद्भुत साहित्य सृजन भी है। उन्होंने अब तक 550 से अधिक ग्रन्थों एवं पुस्तकों की रचना कर जैन साहित्य के भंडार को समृद्ध किया।
पूज्य माताजी ने प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाओं के ग्रन्थों को आगम प्रमाण, सरल शब्दों व हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किये। इन ग्रन्थों में केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि तपस्या से निकला अनुभव, आत्म शुद्धि की साधना और जन कल्याण की भावना समाहित है। उनका यह साहित्य आने वाली पीढ़ियों को जैन धर्म के सिद्धान्तों, भगवान बीतराग की वाणी और आत्म कल्याण के मार्ग का बोध कराता रहेगा। पूज्य माताजी ने अपनी लेखनी से, अपने तप व त्याग के अनुभव से अनेकों विधानों की रचना की, उन विधानों के करने से ऐसा लगता है कि जैसे साक्षात् समवशरण में बैठकर आराधना कर रहे हैं। कल्पट्रम विधान, त्रिलोक महामण्डल विधान, नन्दीश्वर द्वीप विधान, सिद्धचक्र महामण्डल विधान, शांति विधान, इन्द्रध्वज विधान आदि।
इन्द्रध्वज विधान की स्वर्ण जयन्ती महोत्सव पूज्य माताजी द्वारा रचित इन्द्रध्वज विधान की रचना के 50 वर्ष पूर्ण होने पर स्वर्ण जयन्ती महोत्सव के रूप में 30 जुलाई से 26 अक्टूबर 2026 तक मनाया जा रहा है। यह अवसर केवल एक विधान की स्वर्ण जयन्ती नहीं, बल्कि पूज्य माताजी की दीर्घ, आध्यात्मिक साधना और साहित्यिक तपस्या के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। “हर घर ध्वज लहरायेंगे, माँ ज्ञानमती के गुण गायेंगे।
इसी पावन क्रम में जयमाला क्रमांक 20 का अर्थय मेरी जन्म तिथि 19 अगस्त को मेरे परिवार को प्राप्त हुआ। परम पूज्य प्रज्ञाश्रमणी श्री चन्दनामती माताजी के मुखारविंद से प्रतिदिन जयमाला का पाठ किया जाता है। इस पुण्य अवसर पर मेरी माँ श्रीमती कमला देवी जैन बड़जात्या परिवार कामां वालों ने जयपुर निवास पर पून्य माताजी के चरणों में जूम व पारस चैनल के माध्यम से पूर्ण जयमाला अयं समर्पण करने का सौभाग्य प्राम किया।
स्वाध्याय ही परम तप यह माताजी का जीवन संदेश पूज्य माताजी के चिंतन में स्वाध्याय का विशेष स्थान रहा। उनका स्पष्ट कन्देश रहा है कि मंदिर केवल दर्शन के स्थान के साथ-साथ ज्ञान व स्वाध्याय का केन्द्र भी बनें। उनकी प्रेरणा रही है कि मन्दिर-मन्दिर में स्वाध्याय की व्यवस्थायें हों। आवश्यकता व मुविधानुमार जैन पाठशालायें, जैन छात्रावास, जैन तथा जैन विश्वविद्यालय जैसी संस्थाओं का विकास होना बाहिए। जैन स्कूल, कॉलेज, जैन शिक्षा बोर्ड यह भी स्पष्ट है कि पून्य माताजी ने पट्मनन्दि पंचविंशतिका ग्रन्थका स्वाध्याय किया, उसी प्रन्य से वैराग्य की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने स्वाध्याय में ही जैन संस्कृति जैन समाज के लिए अनेकों उपकार किये अनेकों कृतियों का सुजन किया, जो न भूतो न भविष्यति। अतः जैन कुल में पैदा हुए है तो हम सबको जैन कुल की मर्यादा में रहना चाहिए, उसके विपरीत नहीं जाना चाहिए।
यह सन्देश आने वाले समय में और भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि संस्कारित पं का निर्माण केवल सम्पति से नहीं, शिक्षा और संस्कारों से होता हैभगवान राम की जन्म भूमि के पश्चात मोक्ष स्थली मांगीतुंगी का विकास पूज्य माताजी की प्रेरणा से महाराष्ट्र के मांगीतुंगी में प्रथम तीर्थकर भगवान ऋषभजी की 108 फुट ऊँची भव्य प्रतिमा का निर्माण कराकर अहिंसा, त्याग आ बीतरागता के सन्देश को विश्वभर तक पहुंचाने वाली ऐतिहासिक धरोहर बनी।
5 तीर्थकरों व भगवान राम की जन्म भूमि अयोध्या जन्म भूमि का स्वर्णिी विकास-पूज्य माताजी ने तीर्थकरों की जन्म भूमियों के विकास के अन्तर्गत तीर्थकरों यथा भगवान ऋषभदेव, अजितनाथ, अभिनन्दननाथ, सुमतिनाथ अनन्तनाथ स्वामी जी की जन्म भूमि के विकास का संकल्प लेकर उसे साकार रू दिया। आज अयोध्या की ओर सम्पूर्ण जैन समाज का रुझान जन्म भूमि के दर्शन करने का बना है।
यहाँ पर भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत (जिसने ‘भारत’ नाम पड़ा) उनकी भ31 फीट ऊँची प्रतिमाजी विराजमान कर मन्दिर तैयार करवा दिया। भगवान ऋषभदेव के 101 पुत्रों की स्मृति में मन्दिर बनवाया, जो मोक्षगामी थे। नवदेवता मन्दिर, त्रिलोक रचना, 30 चौबीसी व सर्वतोभद्र महल जैसी मुन्दर कृतियों का निर्माण के साथ वातानुकूलित भोजनशाला, आवास व्यवस्था कराना पूज्य माताजी की दूरदृष्टि और संकल्पशक्ति का जीवन्त उदाहरण है। तीर्थंकर भूमियों के संरक्षण व विकास-पूज्य माताजी के प्रेरणा से भगवान महावीर स्वामी की जन्म भूमि कुण्डलपुर (नालंदा), काकन्दी, श्रावस्ती, भदलपुर आदि भूमियों के साथ-साथ अन्य जन्म भूमियों पर भी विकास कार्य करवायें। विश्वशान्ति व अहिंसा की प्रेरणा -पूज्य माताजी का चिन्तन केवल जैन समाज के लिए ही नहीं अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए है। उन्होंने मेट्रीय अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर अहिंसा, शाकाहार, विश्वशान्ति के लिए अनेकों कार्यक्रम व संगोष्ठियां आयोजित करवायीं। इन सभी कार्यों को गति देने, क्रियान्वित करवाने में परमपूज्य प्रज्ञा श्रमणी श्री चन्दनामती माताजी, स्वस्ति श्री रवीन्द्र कीर्ति स्वामी की अहम् भूमिका रहती है और उनका सहयोग के रूप में अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद् के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. जीवन प्रकाश जैन व मुख्य संयोजक प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन है। 93 में अवतरण दिवस एवं 75 वें संयम दिवस के पावन अवसर पर शत-शत नमन एवं विनम्र वंदन। मंगल कामनायें करते हैं उनका तप, त्याग और ज्ञान ज्योति विश्व भर में जैन धर्म का प्रभाव बढ़ाती रहे, स्वास्थ्य उत्तम रहे और उनके सभी संकल्प पूर्ण हों।
पून्य माताजी का जीवन हमें सिखाता है कि गौरवशाली विरासत पर गर्व करने के साथ उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाना भी परम दायित्व है।
देश की युवा पीढ़ी को संगठित करने के लिए जनवरी 1977 में स्थापित अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद् की स्थापना से अब तक उक्त संस्था को सदैव आशीर्वाद, सानिध्य, विशेष मार्गदर्शन और दिशा निर्देश प्राप्न होता रहा है। युवा परिषद् के 50वें स्वर्ण जयन्ती समारोह के अंतर्गत युवाओं को सन्देश दिया कि

  • युवा सगठित होकर देश, शास्त्र व गुरु की रक्षा करें, प्राचीन जैन मन्दिरों एवं पुरातात्विक धरोहरों का संरक्षण करें।

जैन संस्कृति व परम्पराओं को सुरक्षित रखें, साधु-सन्तों के आहार व विहार में महयोग करें, आगम व प्राचीन ग्रन्थों का संरक्षण, अध्ययन और पठन-पाठन करें।
अपने बच्चों को जैन संस्कार देवें और उन्हें स्वाध्याय में जोड़ें पूज्य माँ के उपकारों का अण शब्दों से नहीं चुकाया जा सकता है, उनका जीवन स्वंय जैन संस्कृति का एक जीवन्त महाग्रन्थ है, कन्दामी गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी।
कन्दे, तप, त्याग और स्वाध्याय की महान माध्वी को, वन्दे साक्षात् सरस्वती स्वरुपा को, कन्दे जैन संस्कृति की अमर ज्योति को। शुभ मंगल कामनाओं के साथ।

उदयभान जैन बड़जात्या
महारानी फार्म जयपुर
मो9414306696

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