गंगोदक से गन्धोदक की यात्रा – आचार्य प्रसन्नसागर जी महाराज

निमियाघाट/कोडरमा । अहिंसा संस्कार पदयात्रा के प्रणेता साधना महोदधि भारत गौरव उभय मासोपासी आचार्य प्रसन्न सागर जी महाराज निमियाघाट के सहस्त्र वर्ष पुरानी भगवान पारसनाथ की वरदानी छांव तले विश्व हितांकर विघ्न हरण चिंतामणि पारसनाथ जिनेंद्र महाअर्चना महोत्सव पर भक्त समुदाय को संबोधित करते हुए।
अंतर्मना प्रसन्नसागरजी ने कहा जैन गंगा और सूरज को जितना मानते हैं इतना दुनिया में शायद ही कोई मानता हूं लोग दूर-दूर से यहां आकर गंगा में नहाते हैं अपने शरीर का सारा मैल उसमें डालते हैं और गंगा को गन्दा कर चले जाते हैं लेकिन जैन ऐसा नहीं करते जैन यहां आकर दूर ही खड़े रहते हैं उसके पानी को छूते तक नहीं पैर डालना दूर की बात गंगा का जल गन्धोदक है जैन ग्रंथों के अनुसार गंगा नदी जब हिमालय हिमालय पर्वत से निकलती है और आगे चलकर गोमुख में प्रवेश करके जब नीचे गिरती है तो भगवान ऋषभ देव का अभिषेक करती हुई आगे बढ़ती है और इस तरह उसका जल गंगोदक से गन्धोदक बन जाता है और
गन्धोदक को जैन पैर पर नहीं अपितु श्रद्धा से माथे पर लगाते हैं वही सूर्य उपासना की बात सोच सूरज को जितना जैन आदर देते हैं संसार में शायद ही कोई दूसरा उतना अदर देता हूं जैसे किसी परिजन के बिछड़ जाने पर आप खाना पीना छोड़ देते हैं वैसे ही सूरज के बिछड़ने पर सूरत के अस्त हो जाने पर जैन भी रात में खाना पीना छोड़ देते हैं यही सच्ची उपासना है नदी में खड़े होकर पूर्व दिशा में मुंह करके सूर्य देव को जल आर्ग अर्पण कर देना सूर्य की सच्ची उपासना नहीं है बेईमानी की भी हद होती है नदी का जल उठाया और नदी में ही चढ़ा दिया और कहते हो कि हो गई सूर्य उपासना अरे अपने घर का भी जल चढ़ाया होता तो भी कुछ ठीक होता अगर आप वाकई में हिंदू हैं और सूर्य देव के प्रति श्रद्धा रखते हैं और उसे पूजा का अर्घ्य समर्पण करना चाहते हैं तो घर की पौड़ी पर बैठकर गंगा की कसम खाकर संकल्प करें कि मैं सूर्यास्त के बाद भोजन ग्रहण नहीं करूंगा रात्रि का भोजन नहीं करूंगा दूसरे दिन सूर्य उदय के पश्चात सूर्य दर्शन करके भी अन्न-पानी ग्रहण करूंगा । उक्त जानकारी मीडिया प्रभारी राज कुमार अजमेरा, नवीन जैन ने दी।

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