दिनांक 24 जुलाई 21 का धर्म सन्देश (नीमचौक स्थानक रतलाम से प्रसारित) विषय-गुरू पूर्णिमा
अमावस के अंधकार से पूनम के प्रकाश की और ले जाए वो गुरू होता है । गुरू तो जीवन में अनेक मिलते है। लेकिन सद्गुरु मिलना बहुत मुश्किल है ।पानी के बिना नदी बेकार, अतिथि के बिना आंगन बेकार, पैसा न हो तो पॉकेट बेकार, स्नेह न हो तो परिवार बेकार,सदगुरू न मिले तो जीवन बेकार ।गुरू के बिना जीवन शुरू नही होता है, चाहे कितने ही ग्रन्थ पढ़ लो, कितनी ही विद्वत्ता प्राप्त कर लो लेकिन जब तक गुरूकृपा न मिले तब तक सब व्यर्थ है। माता पिता जन्म देते है लेकिन गुरू जीवन देता है। सद्गुरु के बिना जीवन सँवर नही सकता। देव गुरू धर्म (अरिहंत मेरे देवे, निर्ग्रन्थ गुरु और दया धर्म) केवल यही सच है ।इंद्र की सभा में प्रश्न उठा की सबसे बड़ा कौन। एक देव ने कहा पृथ्वी क्योंकि वो सबका भार ढोती है, दूसरे ने कहा नही शेषनाग क्योंकि उसने पृथ्वी को उठा रखा है, तीसरा बोला अगर शेषनाग बड़ा होता तो शंकर के गले में क्यों पड़ा होता, इसलिए शंकर बड़े है, अगले ने कहा शंकर बड़े होते तो हिमालय पर क्यों खड़े होते, इसलिए हिमालय बढ़ा है, फिर किसी ने कहा हिमालय बढ़ा होता तो हनुमान की हथेली में कैसे आता इसलिए हनुमान जी बड़े, फिर किसी ने कहा की हनुमान जी बड़े होते तो रामजी की सेवा में क्यों होते, इसलिये राम जी बड़े है फिर किसी न कहा रामजी बड़े होते तो गुरू वशिष्ठ के चरणों में क्यों होते। इसलिए गुरू ही सबसे बड़ा होता है ।मिट्टी की द्रोणाचार्य की प्रतिमा के आगे एकलव्य ने धनुर्विद्या सीखी। लेकिन जब गुरू द्रोण ने गुरू दक्षिणा में अंगूठा माँगा तो एकलव्य ने बिना कोई प्रश्न किये तुरन्त अंगूठा काटकर दे दिया ये होता है गुरू के प्रति समर्पण। गुरू यदि छद्मस्थ है और शिष्य केवलज्ञानी हो तो भी गुरू गुरू रहेगा और शिष्य से बड़ा होता है। सद्गुरु का समागम मिलता है तो जिंदगी जीने की कला आ जाती है। गुरू की अदृश्य कृपा हमेशा अपने शिष्य पर रहती है । कोरोनाकाल के भीषण समय में गुरू की असीम कृपा और आशीर्वाद से हम ऐसे अनजान जगह पर छोटे से गाँव पोटला पँहुचे और बहुत ही सुख साता पूर्वक चातुर्मास सहित 7 महीने का समय निकला। में बहुत सौभाग्यशाली हुँ की मुझे आनन्द गुरू के मुखारविंद से 50 वर्ष पूर्व दीक्षा का पाठ मिला। भक्त उनके सामने बैठते और गुरूदेव की एक बार केवल निगाह उन पर पड़ जाए ये तमन्ना करते थे, गुरू से नजरें मिल जाती तो अपने आप को निहाल समझते थे। लिखने वाले मेरे अंतर में गुरू का नाम लिखना, आँखों में लिख दे ज्योति गुरू की नयनों में उनका दीदार लिखना, जिव्हा पर लिख दे नाम गुरू का, हाथों पे लिख दे सेवा गुरू की, तन मन धन सब वारु लिख दे मेरे अंतर में गुरू का नाम लिख दे, पैरों में लिख दे जाना गुरू द्वारे, सारा जीवन ही गुरू के नाम लिख दे, एक मत लिखना बिछड़ना गुरू का चाहे सारे संसार से बिछड़ना लिख दे । मेरे रोम रोम में गुरू का नाम लिख दे लिखने वाले मेरे अंतर में गुरू का नाम लिख दे। रतलाम नगरी में हमेशा गुरूदेवों की कृपा बरसती रही है। दिवाकर गुरूदेव, कस्तूरचन्दजी मसा, मोहन मुनि जी मसा सभी का आशीर्वाद श्रीसंघ पर रहा है आप पर हमेशा गुरूदेवों का आशीर्वाद बना रहे। यह प्रेरक धर्म सन्देश पूज्या महासती मालव कीर्ति उप प्रवर्तिनी कीर्तिसुधा जी मसा ने प्रसारित किया। पूज्या श्री आराधना श्री जी ने अपने धर्म संदेश में कहा की लंका विजय के पश्चात प्रभु राम ने हनुमान से कहा की इस युद्ध में मेरा साथ देने वाले सभी को मैने कुछ न कुछ पद दिया है, और हनुमान में तुम्हे भी कुछ पद देना चाहता हूँ माँगो कौन सा पद चाहिये, हनुमान जी बोले मुझे कोई पद नही चाहिए लेकिन रामजी ने कहा पद तो तुम्हें लेना ही पड़ेगा में अपनी खुशी से तुम्हे दे रहा हूँ ।हनुमान जी बोले पद नही चाहिए पद मिलने से मद आ जाता है। और पद पर रहने वाला बाद में भूत हो जाता है, भूतपूर्व अध्यक्ष, भूतपूर्व मंत्री तो मुझे भूत नही बनना है। आखिर में हनुमान जी बोले पद देना ही है तो मुझे एक नही 2 पद चाहिए क्या आप देंगे राम बोले अवश्य दूँगा तो हनुमान ने कहा मुझे आपके ये जो दो पद है आपके चरण कमल बस यही चाहिए में आपके चरणों की सेवा करना चाहता हूँ ।गुरू पूर्णिमा का मनाना सार्थक हो जाएगा यदि आप भी हनुमान जी की तरह अपने अपने गुरुदेव के प्रति पूर्ण रूप से। समर्पित हो जाओ। हनुमान की तरह एकलव्य की तरह अमर हो जाओगे यदि सच्चे मन से गुरू के प्रति श्रद्धा भक्ति रखी तो । गुरू की कृपा हो गई तो कभी कुछ माँगने की जरूरत नही रहेगी।