सदगुरू के चरणों में बैठकर मन को शांति मिलती है- उपप्रवर्तिनी बाल ब्रम्हचारी मालवकिर्ती पू.श्री किर्तीसुधाजी म.सा

रतलाम । नीमचौक स्थानक पर धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए जिनशासन प्रभाविका, ज्ञानगंगोत्री, मेवाड़ सौरभ उपप्रवर्तिनी बाल ब्रम्हचारी मालवकिर्ती पू.श्री किर्तीसुधाजी म.सा ने कहा कि जो बात दवा से नही होती वो दुआं से हो जाती है, काबिल गुरू यदि जीवन में मिल जाए तो बात खुदा से हो जाती है।
जो गुरू शिष्य को भी अपने समान बना लेता है वो ही सद्गुरु होता है । सद्गुरु के चरणों में बैठकर मन को शांति मिलती है, हस्तरेखा तो 51 रुपए लेकर भी लोग देख लेते है लेकिन सद्गुरु वो होता है जो हमारे भाग्य की रेखा बदल दे, हस्तरेखा दिखाने से क्या होगा भाग्य तो उनका भी होता है जिनके हाथ नही होते है। रावण के पास सबकुछ था, वो स्वर्ग तक सीड़ी बनाने की सोच रखता था, समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने का माद्दा रखता था, देवता भी उसके वश में थे, इतना सबकुछ होने के बाद भी उसके पास सद्गुरु नही थे इसलिए आज लाखों साल बाद भी कोई अपनी संतान का नाम रावण रखना पसंद नही करता है। इसलिए जीवन में सद्गुरु का होना बहुत जरूरी है।
घर में शुभ काम होता है तो घर में मंडप बनाते है मंडप में चार स्तम्भ होते है। वैसे ही चातुर्मास के शुभ अवसर पर मण्डप के चार स्तम्भ ब्रह्मचर्य का पालन, रात्रि भोजन का त्याग, जमीकंद का त्याग और सौंदर्य सामग्री का त्याग इन चार मज़बूत स्तम्भ के बाद मजबूत छत चाहिए और वो छत है गुरु कृपा रूपी छत।
सच्चे शिष्य गुरू के लिये मर मिटने को तैयार हो जाते है। सिखों के अंतिम गुरू गोविंदसिंह का जब अंत समय आया तो उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा की मेरे बाद कोई भी मेरा स्मारक न बनाए, और अगर किसी न स्मारक बनाया तो उसके कुल का अंत हो जाएगा।
लेकिन राजा रणजीत सिंह ने कहा मुझे गुरू का याद को अमर करना है में गुरु का स्मारक बनाऊँगा, सभी ने उन्हें समझाया की स्मारक नही बनाना है, गुरू की बात कभी खाली नही जाती है, लेकिन राजा अपने प्रण पर अड़े रहे कहा की भले ही मेरे कुल का अंत हो जाए लेकिन गुरू की निशानी को अमर करना है, और उन्होंने स्मारक बनवाया, उद्घाटन करने के पहले भी उन्हें लोगो ने समझाया की बना दिया तब तक ठीक है अब आप इसका उद्घाटन मत कीजिये लेकिन उन्होंने उद्घाटन किया और उसके कुछ समय बाद उनके एक मात्र पुत्र का निधन हो गया लेकिन उन्होंने कोई शोक नही किया और न ही अपने निर्णय पर पछतावा किया ये होती है सच्ची गुरुभक्ति।
अब जब चार स्तम्भ भी स्थापित हो गए गुरूकृपा रूपी छत भी बन गई तो जैसे मंडप में गजानन गणेश की स्थापना करते है वैसे ही सर्वप्रथम गणधर गौतम स्वामी का स्मरण करना है।
गाती तो लता मंगेशकर भी है और गाया मीरा बाई ने भी था, लता मंगेशकर को धन दौलत और पुरूस्कार मिले लेकिन मीराबाई को परमात्मा मिले, क्योंकि मीरा बाई अन्तर्मन की भक्ति से गाती थी ।
अंतर की भक्ति से चन्दनबाला को महावीर, मीरा को कृष्ण, राजुल को नेमीनाथ मिले। प्रभु की प्रार्थना संकट की वेला में अमोघ शस्त्र बन जाती है। कभी कभी लाखों पेज पढऩे पर भी जीवन में अंतर नही आता है और कभी एक लाइन पढ़कर भी जीवन बदल जाता है। जीवन भर जिनवाणी सुनते सुनते भी कोई परिवर्तन नही आता है और कभी वाक्य भी जीवन की दिशा बदल देता है। वैष्णव समाज के एक बहुत बड़े सन्त हुए दीक्षा लेने के पूर्व वे बहुत बड़ी दुविधा में थे की संसार में रहना है या दीक्षा लेना है वो हमेशा इसी सोच में उलझे रहते थे, इसी सोच के साथ एक बार वो बीच राह में चल रहे थे तो पीछे बैलगाड़ी वाले ने आवाज लगाई की किसी भी एक तरफ हो जाओ बीच राह में चलोगे तो दुर्घटना हो जाएगी। बस यह एक वाक्य उनको समझ आ गया और उन्होंने तुरंत सन्यास का निर्णय लिया।
न जाने किस समय जल बरस जाए, न जाने किस समय बीज फल बन जाए, साधना में हर समय सजगता की जरूरत है न जाने कब भगवान से मुलाकात हो जाए । यह प्रेरक सन्देश जिनशासन प्रभाविका, ज्ञानगंगोत्री, मेवाड़ सौरभ उपप्रवर्तिनी बाल ब्रम्हचारी मालवकिर्ती पू.श्री किर्तीसुधाजी म.सा ने प्रदान किया।
पूज्या श्री आराधना श्री जी मसा ने अपने धर्म सन्देश में फरमाया की । तन तो टेम्पल में लेकिन मन चप्पल में रहता है। जब भी टेम्पल में जाओ धर्म स्थान पर जाओ तो दिमाग बाहर छोड़कर जाओ केवल दिल लेकर जाओ क्योंकि दिमाग तर्क करता है और तर्क से श्रद्धा कमजोर होती है।
हमारा शरीर एक बिल्डिंग है और इसमें पाईप लाइन बिछी हुई है, धर्मस्थान पर जाओ तो यह पाइपलाइन लीकेज लेकर मत जाओ। कान की पाइप लाइन से जिनवाणी सुनना है, लेकिन यदि ये पाइपलाइन लीकेज हुई तो जो बाहर मनपसन्द गाने चल रहे है कान उन्हें सुनने लगेगा और जिनवाणी सुनना बन्द कर देगा।
आँख रुपी पाइपलाइन केवल गुरू की और रहनी चाहिए लेकिन ये पाइपलाइन भी लीकेज हुई तो कौन आया कौन गया, किसने कैसी साड़ी पहनी है, क्या गहने पहने है, प्रवचन में कितनी संख्या है इन सब को देखेगी। नाक रूपी पाइपलाइन लीकेज हुई तो अड़ोसी पड़ोसी के इत्र डियो की खुशबू की और ध्यान जाएगा, पड़ोस में बढिय़ा नमकीन बन रहा है तो ध्यान जिनवाणी से हटकर उस नमकीन की खुशबू की और चले जाएगा । शरीर को थोड़ी सी भी असुविधा हुई गर्मी ठंड आदि लगी तो जिनवाणी की और से ध्यान भटक जाता है ।
लेकिन अगर ये सब लीकेज रहे तो जिनवाणी रूपी अमृत जैसा पानी आत्मा तक पँहुच नही पाएगा और यदि जिनवाणी ह्दय में आत्मा में नही उतरी तो कल्याण नही होना है । इसलिए जिनवाणी सुनने आए तो दिल से आए दिमाग से नही और लीकेज बन्द करके जिनवाणी को अंतर की गहराईयों तक पंहुचाए।

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