रतलाम। मुनि और मुनित्व, मानव और मानवता तथा साधक और साधकता में बहुत फर्क होता है। मुनि वेश से मुनि कहलाता है, लेकिन मुनित्व भावों में होता है। मुनित्व का भाव जिसमें होता है, उसमें अहम नहीं होता। मुनि और अहम विपरीत धु्रव है। ये कभी साथ नहीं चल सकते।
यह बात मालव केसरी प्रसिद्ध वक्ता पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य श्रमण संघीय प्रवर्तक पंडित रत्न पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने कही। नोलाईपुंरा स्थित श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल स्थानक में धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तकश्री ने कहा कि त्यागी व्यक्ति मुनि कहलाते है। मुनि निरंकारी होता है, यदि उसमें किसी भी बात का अहम है, तो इसका तात्पर्य उसके लिए मोक्ष का द्वार नहीं खुला है। वर्तमान समय में सभी अहम में उलझे हुए है। घर हो, समाज हो सभी जगह अहम फैला हुआ है। राजनीतिक पार्टियां भी अहम के कारण ही बनती है,क्योंकि हर व्यक्ति चाहता है कि उसका प्रभुत्व रहे।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि परमात्मा के अनुसार अहंकार रहित रहो, तो प्रगति होती है। विडंबना है कि मनुष्य लोक में आज मान कषाय ही सबसे बडा है और इके कारण व्यक्ति कही भी सुखी नहीं है। अहंकार के कई रूप है, ये रूप का, ज्ञान का, लाभ का, बल का, ऐश्वर्य आदि कई प्रकार आता है, इसलिए इससे सचेत रहे। प्रवर्तकश्री ने 17 मार्च को चैमासी पक्खी पर्व के अवसर पर अधिक से अधिक तप आराधनाएं करने का आव्हान किया। इस दौरान पूज्य श्री दर्शन मुनिजी मसा उपस्थित रहे। पूज्या महासती श्री चेतना जी श्री लाभोदया जी, श्री चंदनबाला जी, श्री रमणीक कुँवर जी, श्री कल्पना जी, श्री चंदना श्री जी, श्री महिमा श्री जी ने स्तवन प्रस्तुत किए। तपस्वियों द्वारा तप के प्रत्याख्यान लिए गए। धर्मसभा का संचालन सौरभ मूणत ने किया। अंत में श्री सौभाग्य अणु प्रकाश भक्त मंडल द्वारा प्रभावना का वितरण किया गया। आतिथ्य सत्कार का लाभ पूनम चंद जी मूणत परिवार ने लिया |