- समय का चक्र बहुत तीव्र गति से भाग रहा है..
- इसलिए ना अपने ज्ञान का अहंकार करो,*
- ना वाणी का और ना परम्परा का..!

सम्मेदशिखर जी । आज साधु समाज और जैन समाज में बहुत बड़ी असमंजस की स्थिति चल रही है। साधु – समाज को आगम और सिद्धान्त का ज्ञान उनको परोस रहे हैं, जो लोग अन्धों की बस्ती में दर्पण की दुकान खोलकर बैठे हैं। समाज में – साधु ब्यास पीठ पर बैठकर समाज को क्या सिखाना चाहते हैं-? कोन सा आगम का ज्ञान देना चाहते हैं -? इन 10-15 वर्षों में जितना कुये का पानी पीकर साधुओं ने समाज को बरगलाया है, शायद इससे पहले जैन समाज इतना ना ही गुमराह हुआ ना भटका।* ब्यास पीठ पर बैठकर धर्म की आड़ में, बड़ी बड़ी बातें तो बहुत हो जाती है लेकिन तदनुरूप आचरण हम स्वयं कहाँ कर पाते हैं-? जब वह बातें स्वयं पर अमल करने की आती है, तो हम फिसड्डी बन जाते हैं।
आज कौन से स्कूल की एक क्लास में पढ़ने वाले सभी बच्चों ने 100 में 100 अंक प्राप्त किये-? शायद हर क्लास में दो, चार, पाँच बच्चे ही अच्छे अंक ला पाते हैं। मेहनत तो सभी बच्चे अच्छे से अच्छे अंक लाने की करते हैं लेकिन सबका अपना अपना क्षयोपशम है। अपना अपना नसीब है। इसी प्रकार सभी साधु अपनी अपनी क्षमताओं से, अपनी चर्या का निर्वाह कर रहे हैं। दोष, कमी, किसमें नहीं है-? कोई भी साधु इस पंचम काल में दूध का धूला नहीं है। किसी के दोष दिख जाते हैं, और किसी के दोष दब जाते हैं। साधु का मार्ग, भगवान बनने का मार्ग है। इसलिए हम अपनी क्रिया को, चर्या को, त्याग, साधना को देखें और अपनी विशुद्धि को बढ़ायें। समाज को नहीं बरगलायें। अपना ज्ञान, अपने आपको परिमार्जन करने में लगायें, तब तो स्वाध्याय करना, आगम को जानना कार्यकारी है। अन्यथा हम भी गोबर पे वर्क लगे जैसे साधु होंगे। जैसे –
एक ज्ञानी साधु – अपने कमण्डल के पानी से जिनबिम्ब का अभिषेक करवा रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – समयसार की आड़ में द्वेष, कषाय, मन की भड़ास निकाल रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – समाज में दूसरे साधुओं के प्रति द्वेष, कषाय, वैमनस्यता का पाठ पढ़ा रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – टमाटर और लोकी के रस से जिनबिम्ब का अभिषेक करवा रहे हैं।
एक ज्ञानी साध्वी – समाज में परम्परा का कचरा फैला रही हैं।
एक ज्ञानी साधु – समाज में ऐ.सी, कुलर, गर्म-गर्म खाने को आगम बता रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – सप्तरंगी अभिषेक को धर्म की प्रभावना कह रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – भगवान का स्वयं अभिषेक करके श्रावक को धर्म सीखा रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – सुबह चार बजे भगवान की पूजा-भक्ति, पाठ-अनुष्ठान करवा रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – क्षुल्लक को दीक्षा में पिच्छी नहीं, रूमाल दे रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – कुन्दकुन्दाद्यो को पुष्पदन्ताद्यो बता रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – गृहस्थों के घरों में रूककर पाठशाला चला रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – देवी देवताओं की भगवान जैसी पूजा पाठ अभिषेक करवा रहे हैं।
एक ज्ञानी साधु – दिन भर लैपटॉप, वीडियो कॉल से ज्ञान,और मोबाइल में लगे हुए हैं।
आप ही सोचो – समाज किसको सही और किसको गलत माने -?
सब बातों का एक ही जवाब – मेरी ढपली मेरा राग। सबके अपने आगम और अपने तर्क। इसलिए – अपने अपने लोटे का पानी छानकर पीओ और अपना कल्याण का मार्ग प्रशस्त करो…!
अन्तर्मना प्रसन्न सागर जी महाराज