समता, कर्म और आत्म-साधना का दिया संदेश, स्वाध्याय व पारायण पर दिया विशेष जोर


रतलाम 28 अप्रैल । स्टेशन रोड स्थित श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में आज मुनि श्री 108 निर्णय सागर जी महाराज ससंघ के सान्निध्य में भव्य प्रवचन आयोजित हो रहा है। अपने उद्बोधन में मुनि श्री ने जीवन में कर्म सिद्धांत, समता भाव एवं आत्म-साधना के महत्व को विस्तारपूर्वक समझाया।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में सुख-दुख का कारण उसका स्वयं का कर्म होता है। जब कर्म प्रतिकूल होते हैं तो परिस्थितियाँ भी विपरीत हो जाती हैं, जबकि अनुकूल कर्म होने पर सब कुछ सहज हो जाता है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में दूसरों को दोष देने के बजाय अपने कर्मों को समझना चाहिए।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे खोटा सिक्का बाजार में नहीं चलता, वैसे ही अशुद्ध कर्मों के साथ जीवन में सफलता संभव नहीं है। व्यक्ति को अपने आचरण और विचारों को शुद्ध बनाना चाहिए।
प्रवचन में एक प्रेरणादायक प्रसंग सुनाते हुए मुनि श्री ने बताया कि कठिन परिस्थितियों में भी आत्म-साधना संभव है। उन्होंने कहा कि सच्चा साधक वही है जो जंगल जैसी विपरीत परिस्थिति में भी आत्म-चिंतन और साधना जारी रखे। समता भाव को अपनाते हुए जीवन के हर उतार-चढ़ाव को स्वीकार करना ही सच्चा धर्म है।
मुनि श्री ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को नियमित स्वाध्याय, पारायण और धर्म चर्चा में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि धर्म को जीवन में उतारना आवश्यक है। इसके लिए सामूहिक पारायण एवं प्रतिदिन कुछ समय धर्म के लिए निकालने की प्रेरणा दी।
उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ है, इसलिए इसे व्यर्थ न गंवाते हुए आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए। अंत में मुनि श्री ने समता, संयम और साधना को जीवन का आधार बनाने का संदेश दिया।