संत समाज को जीने की कला सिखाता है तथा समाज को सत्य नीति आदर्श सिद्धांतों की ओर अग्रसर करने हेतु प्रेरित करता है-दण्डी स्वामी आत्मानन्द जी सरस्वती

रतलाम। संत समाज को जीने की कला सिखाता है तथा समाज को सत्य नीति आदर्श सिद्धांतों की ओर अग्रसर करने हेतु प्रेरित करता है , संत वह आईना है जो व्यक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप से रूबरू करा कर उसमें अध्यात्मिक चेतना पूर्णत्व का प्रादुर्भाव करता है उक्त बात श्रृंगेरी मठ क़े दण्डी स्वामी आत्मानन्द जी सरस्वती ने कही ।
हंसराज ज्योति धारवा द्वारा आयोजित व भावताचार्य पं.चेतन शर्मा क़े मुखारविंद से 8 मई से आरंभ हुई शक्ति नगर स्थित संगीतमय श्रीशिवमहापुराण में संतों का वृहद समागम हुआ । जिसमें श्रृंगेरी मठ कांची कोठी क़े दंडी स्वामी आत्मानंद जी सरस्वती महाराज , श्री श्री 1008 महंत राज राजेश्वरी मुनि हरिहर उदासीन अखाड़ा साध्वी राज राजेश्वरी मुनि बगलामुखी उपासक हैं । खाटू श्याम अखाड़े की महामंडलेश्वर , अखंड ज्ञान आश्रम क़े संत देवस्वरूपानंद जी महाराज , वैदिक जाग्रति ज्ञान विज्ञान पीठ के संस्थापक जाग्रति ज्योतिष धाम के अध्यक्ष ज्योतिषाचार्य पं.संजयशिवशंकर दवे , भागवताचार्य पं.संजय मिश्रा, वेदाचार्य आचार्य शैलेंद्र जी जोशी ने श्रध्दालुजन को अपने उद्बोधन क़ा अमृतपान कराकर शुभाशीष प्रदान किया । पं.चेतन शर्मा ने इस मौके पर उद्बोधन देते हुए बतलाया की वर्तमान समय पर कई बड़े आयोजन प्रतिष्ठा में सनातनी संतों की अवहेलना की जा रही है जिसके मद्देनजर संतो को पुन: उनकी गरिमा और सम्मान प्राप्त हो तथा समाज उनके प्रति आदर सम्मान रखें इन्हीं उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए आगामी समय पर रतलाम में होने वाले वृहद धार्मिक आयोजनों भागवत आदि पुराणों के वाचन स्थल में संतों की उपस्तिथि हो सन्तो का शुभाशीष जनमानस को मिले इसे हेतु संतों का समागम रखा गया है ।

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