- अन्तर्मना उवाच (666) – कहते हैं ना…..
- मेंढक को चाहे सोने की ईंट पर बैठा दो,
- वो जब भी छलांग लगायेगा तो गन्दे नाले में ही लगायेगा..!

वैसे ही समाज में कुछ तथा कथित पन्थ, सन्त, सम्प्रदाय के ठेकेदार, जो आज धर्म की नहीं पन्थवाद, संतवाद, ग्रंथवाद और सम्प्रदाय को ऐसे फैला रहे हैं जैसे बेशरम का पेड़। बहुत सी बातें इन्सान को बढ़ती उम्र के साथ पता चलती है, और संभवत: कुछ हद तक समझ भी आती है। सठियाने या पैंसठयाने को बढ़ती उम्र कहा जाता है। लेकिन वास्तव में उम्र घट रही होती है। अब समाज में धर्म की बात नहीं, पन्थवाद, सन्तवाद और सम्प्रदाय की चर्चा होती है। इसलिए मन्दिरों में अभिषेक, पूजा, विधान, भक्ति में वाद-विवाद, पन्थवाद आड़े आ जाता है। यह सच है – कि हम मानसिक, वैचारिक, व्यवहारिक रूप से धर्म के मूल सिद्धांत से भटक गये हैं। सभी साधु सन्त, धर्माचार्य अपने अपने परचम लहराने और बेशरम की जड़ो को मजबूत करने में लगे हुये हैं। सन्त, पन्थ और सम्प्रदाय भी तो अलग अलग जातियाँ ही तो है। हम सिर्फ नाम से जैन हैं लेकिन जैन कहां है- हम तो सद्दाम हुसैन हैं।
सौ बात की एक बात-यह सन्तवाद, पन्थवाद, सम्प्रदाय और जातिवाद ने समाज में सदभाव की जगह अलगाव के बीज ज्यादा बोये। जैसा बोया वैसा ही उगा और वैसा ही हमारी आने वाली पीढ़ी झेलेगी। जो सुना था वो आज सच ही निकला । बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से होये । उक्त जानकारी राज कुमार अजमेरा कोडरमा ने दी ।