संत को भगवान का दर्जा न दे

अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, पर्यावरणविद्)

भारत एक धर्म परायण देश है यहा जनता बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की है इसलिए अनेक संत विभिन्न विभिन्न धर्मों के हिंदुस्तान में है जो जनता से सीधे संपर्क में रहते हैं। अनेक संत वास्तविक संत है परंतु उनकी आड़ में कई नकली संत भी हैं। पढ़े लिखे हो या अनपढ़ हो यहां संत को आम जनता भगवान का रूप दे देती है। जब-जब संत के नाम के आगे बड़ी-बड़ी ढेर सारी उपाधीया लगाई जाएगी तब तक समाज में चेतना नहीं आएगी बिखरा रहेगा, उपाधीया लगाना है तो सिर्फ भगवान के नाम के आगे लगाओ। सर्वव्यापी तो भगवान है संत मात्र कुछ समूह लोगों के समूह का प्रमुख धर्म प्रचारक है उन्हें भगवान का दर्जा ना दे। बात बहुत कड़वी है पर सच है।
कुछ पैसेवाले लोगों द्वारा उनको आर्थिक सपोर्ट किए जाने पर संत, कई संत (मैं सभी संतो की बात नहीं कर रहा) अपने नाम का प्रचार और अपनी शैली व स्वयं के नाम के धर्मस्थल बनाते जा रहे हैं जो कि गलत है। क्यों आज सब धार्मिक स्थान या अखाड़े अलग-अलग नाम से हैं जबकी सभी राम के भक्त है, महावीर के भक्त हैं या अलग-अलग जाति वर्ण के है क्रिश्चियन में भी दो ग्रुप है मुस्लिम में भी दो ग्रुप है यह सब गलत है और जो गलत है वह गलत है।
काश संत या धर्म प्रचारक बड़े-बड़े धार्मिक स्थल पर शिक्षा और स्वास्थ्य के केंद्र भी खुलवा देते तो यह बड़ी समाज सेवा हो जाती।
एक लेखक और चिंतक होने के नाते मैंने विवेचना कि और आप सब उस पर मंथन करे है, जो आपको सही लगे वही करिए। हम सिर्फ चर्चा कर रहे हैं किसी भी विवाद को जन्म नहीं दे रहे हैं। किसी को बुरा लगा हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूं।

Play sound