तप चक्रेश्वरी महासती जी का चातुर्मास हेतु रतलाम नगर में आगमन

रतलाम । जैन दिवाकर प.पूज्य गुरुदेव जगत वल्लभ श्री चौथमल जी म.सा. एंव श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाक्टर शिवमुनिजी की आज्ञानुवर्तिनी एंव मालव सिंहनी गुरुणी मैय्या श्री कमलावती जी म.सा. की सुशिष्या तप चक्रेश्वरी आयम्बिल तप आराधिका गुरुणी मैय्या पूज्या श्री अरुणप्रभाजी महासतीजी., शतावधानी गुरु कीर्तिजी महासतीजी, मधुर गायिका गुरु निधिजी महासती एंव नवदीक्षिता अरुण कीर्ति महासती जी आदि ठाणा 04 का श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ नीमचौक स्थानक में चातुर्मास हेतु रतलाम नगर में आगमन हो चुका है।
मसा अभी श्री जैन दिवाकर स्मारक पर विराजमान है, दिनाँक 23 जून को सन्त नगर स्थानक पर विराजित रहेंगे उसके पश्चात भगतपुरी, तेजानगर, तेलियों की सड़क, रामगढ़, शांतिनगर, स्टेशन रोड़, राजस्व कालोनी, रतनपुरी, कस्तूरबा नगर आदि नगरीय क्षेत्रों में भ्रमण करते हुए दिनाँक 08 जुलाई शुक्रवार को संघ अध्यक्ष सुरेश कटारिया के निवास स्थान से चल समारोह के रूप में नीमचौक स्थानक पर चातुर्मास हेतु प्रवेश करेंगे ।
संघ के प्रवक्ता ने बताया की
पूज्य महासती जी का वर्ष 2011 में भी नीमचौक स्थानक पर भव्य चातुर्मास हो चुका है। गुरुणी मैया पूज्या श्री अरुणप्रभाजी मसा पिछले 42 वर्षों से उपवास एंव आयम्बिल तप की कठोर साधना कर रही है। पिछले 22 वर्षों से अधिकतम दिनों में आपके आयम्बिल रहते है। अभी 08 जून से 04 सितम्बर तक 89 दिनों तक आप लगातार आयम्बिल तप की आराधना करेंगे। इसीलिए आपको तप चक्रेश्वरी की उपाधि प्रदान की गई है ।
आयम्बिल तप के अंतर्गत दिन में केवल 1 बार एक बैठक पर तेल, घी, नमक, मिर्च, दूध, दही के बिना केवल उबला हुआ सादा भोजन किया जाता है, रसेन्द्रीय पर विजय प्राप्त करने वाला तप आयम्बिल तप कहलाता है ।
आपकी सुशिष्या गुरु कीर्ति जी मसा ने शतावधानी ज्ञान प्राप्त किया है । शतावधानी क्रिया आश्चर्यजनक याददाश्त का उदाहरण है जो की गहन अध्ययन, ध्यान एंव देवी सरस्वती की आराधना से ही सम्भव है।
ऐसे दिव्य महासती मण्डल के चातुर्मास के आगमन से श्रीसंघ में हर्ष व्याप्त है एंव चातुर्मास एंव प्रवेश की तैयारियां जोर शोर से चल रही है।

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