

रतलाम । वैसे तो लगभग सभी पर्व 1/2/4/8 दिन लेकिन जैनियों का चातुर्मास पर्व 120 दिन का होता है । हमारी आत्मा पर 8 कर्म लगे हुए है, जिनकी हम दान, शील, तप, भाव के द्वारा निर्जरा कर सकते है।
अनन्त भव की पुण्यवानी होती है तब जाकर जैन कुल मिला उससे भी बड़ी पुण्यवानी की धर्म स्थान पर जाने का भाव मन में आया। यह आत्मा 70 क्रोडा क्रोडी सागरोपम तक भव भृमण करती है।
4 गति 84 लाख जीवयोनि में यह आत्मा लगातार भटकती है, 69 क्रोडा क्रोडी सागरोपम की स्थिति पूर्ण होने के बाद मन में धर्म के पथ पर आगे बढऩे के भाव जागृत होते है। भगवान महावीर ने बताया है की ये शरीर शास्वत नही है, लड़की के मकान के ढांचे के समान शरीर के भीतर हड्डी का ढांचा है, कब यह ढाँचा डह जाएगा इसका कोई भरोसा नही है। हथेली की अंजुली में पानी जितनी देर टिकता है, वैसे ही हमारा आयुष्य है। आयुष्य धीरे धीरे समाप्ति की और है। आयुष्य समाप्त हो जाए उसके पहले अपने आप को धर्म आराधना के पथ पर मोड़ लो।
वनिता नगरी में भगवान आदिनाथ ने अपने समोसरण में फरमाया की परिग्रह को कम करो यह नरक का द्वार है। 6 खण्ड के राजा भरत चक्रवर्ती ने परिग्रह के बारे में सुना तो उसे स्वंय पर संशय हुआ की मेरे पास तो इतना अधिक परिग्रह है तो मेरी गति क्या होगी, भरत चक्रवर्ती ने अपनी जिज्ञासा प्रभु आदिनाथ के समक्ष रखी और अपनी गति के बारे में पूछा तो भगवन ने बताया की तुम चरम शरीरी हो इसी भव में इसी शरीर के साथ मोक्ष में जाओगे। इसका कारण यह था की इतना परिग्रह होने के बावजूद भी भरत चक्रवर्ती अपनी आत्मा में रमण करते थे, वे संसार के सभी सुखों को नश्वर मानते थे ।
संघ प्रवक्ता ने बताया की गुरु पूर्णिमा और चातुर्मास की शुरुआत के शुभ अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाओं ने बेले का संकल्प लेते हुए आज प्रथम उपवास के प्रत्याख्यान लिए। नन्ही बाल तपस्वी कुमारी देशना मूणत ने 15 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किये। दिनाँक 14 जुलाई के जाप श्री मांगीलालजी सुभाष जी मंडलेचा के निवास स्थान 76, वेद व्यास कालोनी सूरज हाल के पीछे रखे गए है।