रतलाम । जैसा की पूर्व प्रवचन में बताया था की शहद का घड़ा शहद का ढक्कन, शहद का घड़ा विष का ढक्कन, विष का घड़ा शहद का शक्कन, और विष का घड़ा विष का ढक्कन।
सर्प के दाँत में जहर रहता है, सुवर, कुत्ते, शेर की दाढ़ में जहर होता है, बिच्छू की पूंछ में जहर होता है, लेकिन मानव ऐसा जीव है जिसकी जिव्हा पर जहर हो सकता है।
पानी और वाणी दोनों को साच समझकर उपयोग करना चाहिए, देशी घी को जैसे आप सोच समझ कर वापरते हो वैसे ही हमें अपनी वाणी को सोच समझकर वापरना चाहिये। साधु को आठ प्रकार की भाषा नही बोलना चाहिए कर्कशकारी , कठोरकारी, छेदनकारी, भेदनकारी, निश्चयकारी । साधु साध्वी कभी निश्चयकारी भाषा नही बोलते है। वो हमेशा यही बोलते है जैसा अवसर होगा देखेंगे या सूखे समाधे होने पर आएंगे।
एक राजपूत महिला का पति 12 वर्षों से घर से बाहर गया हुआ था, वो एक सन्त के यँहा प्रतिदिन प्रवचन सुनने जाती थी, तीन महीने के बाद उसने महात्मा से पूछा मेरे पति 12 वर्षों से बाहर गए हुए है उनका कोई समाचार नही है, गुरुदेव के मुँह से सहज ही निकल गया तेरा पति कल आ जाएगा। उस महिला को सन्त की वाणी पर विश्वास था, वो घर जाकर घर की अच्छे से साफ सफाई करती है, दूसरे दिन अच्छे से सज सँवर कर आरती की थाली लेकर बाहर बरामदे में बैठ कर इंतजार करती है। और दोपहर के वक्त उसका पति वास्तव में आ जाता है । पति को अपनी पत्नि को ऐसे सजा सँवरा देखकर शक होता है सोचता है मेने तो कोई सूचना दी नही थी फिर ये किसके लिये सज सँवर कर बैठी है, वो क्रोधित होकर पत्नि से इस बारे में पूछता है पत्नि कहती है मुझे सन्त ने बताया था।
पति को यकीन नही होता है वो सन्त के पास जाता है और क्रोध में कहता है की मेरी ये घोड़ी गर्भवती है बताइए इसके गर्भ में कितने बच्चे है । सन्त चुप रहा व्यक्ति सन्त को बहुत भला बुरा कहता है और कहता है मेरी पत्नि चरित्रहीन है, आखिर में सन्त को बोलना पड़ता है की इसके गर्भ में दो बच्चे है, वो व्यक्ति उसी वक्त उस घोड़ी का पेट चीर देता है और वास्तव में 2 बच्चे थे, इस प्रकार 3 जीव की हत्या हो जा जाती है। बात पत्नि को पता चलती है तो वह अपने आप को खत्म कर लेती है, सन्त की पश्चाताप की वजह से जावजीवन संथारा ग्रहण करके प्राण त्याग देते है। सन्त की एक निश्चयकारी भाषा से इतने जीवो का घात को गया। अंदर कड़वी गाली ऊपर से मीठी बोली अक्सर दुनिया में दूसरी और तीसरी श्रेणी के व्यक्ति ही मिलते है, सबको प्रयास करना चाहिये की प्रथम श्रेणी शहद की मटकी और शहद का ढक्कन जैसा जीवन जिया जाए। शतावधनी पुयाश्री गुरु कीर्ति ने मेरे महावीर को जानों विषय को आगे बढाते हुए फरमाया की संभूति आचार्य की प्रेरणा से विश्वभूति मुनि मासक्षमण, मासक्षमण तप करने लगे लेकिन उसके भीतर विशाखानन्दी के प्रति प्रतिशोध कम नही हुआ, बल्कि बढ़ता ही गया। उग्र तप से शरीर कृषकाय हो गया, हड्डियों का ढाँचा हो गया। वो गुरुदेव के पास गया और कहा में तप तो कर रहा हूँ लेकिन विशाखानन्दी को भुला नही पा रहा हूँ, उसे माफ नही कर पा रहा हूँ, वो मेरे दिलो दिमाग से हट नही पा रहा है । उसे भुलाने के लिए मुझे ये नगर छोडऩा पड़ेगा ।
गुरु ने समझाया की नगर छोडऩे से कुछ नही होगा, तू कँही भी चले जा लेकिन तू उसे भुला नही पाएगा। कभी किसी से दुश्मनी हो जाए तो रात में सोने के पहले उसे माफ कर दो, अपने ह्दय में दुश्मन को घर मत बनाने दो। लेकिन विश्वभूति मुनि नही माना बस गुरुदेव मुझे यँहा से जाने की आज्ञा दो। गुरुदेव में आज्ञा दी चलते कोसो दूर मथुरा नगरी में पँहुच गए। उनका मासक्षमण पूर्ण हो गया, अगले दिन पारणा था, योग संयोग से मथुरा के राजा की कन्या का स्वंयवर था, राजा ने विशाखानन्दी को भी बुलवाया था। विशाखानन्दी महल के झरोखे में बैठा था नीचे छोटी संकरी गली के मुहाने पर एक गाय ने बछड़े को जन्म दिया था, वो बछड़े की रक्षा के लिए गली के मुहाने पर खड़ी थी, विश्वभूति मुनि उधर से निकले विशाखानन्दी दूर झरोखे में बैठा होने के कारण और मुनि की काया बहुत ही दुर्बल होने के कारण पहचान नही पाया। गाय ने मुनि को अपनी और आता देख अपने बछड़े की रक्षा के लिये मुनि को टक्कर मार दी दुर्बल शरीर और कमजोरी की वजह से विश्वभूति मुनि जमीन पर गिर गए। अब विशाखानन्दी फिर से ध्यान से नीचे देखता है तो विश्वभूति मुनि को पहचान जाता है। आगे विशभूति और विशाखानन्दी में क्या बातचीत होती है ये अगले प्रवचन में पता चलेगा।