रतलाम । भारत देश में आज से नही अनादिकाल से भक्ति की गंगा बहती रही है। गौतम स्वामी ने प्रभु महावीर से प्रश्न किया की भक्ति कितने प्रकार की होती है । प्रभु ने फरमाया की भक्ति दो प्रकार की होती है स्वार्थमय और नि:स्वार्थमय ।
हम एक दो चार उपवास करते है और चाहते है की हमारा फंला कार्य पूर्ण हो जाए, व्यक्ति सुबह सुबह दुकान खोलता है तो दीपक अगरबत्ती लगाता है भगवान के हाथ जोड़ता है भक्ति करते हुए भगवान से यही माँगता है की आज मेरी दुकान का धन्धा बढिय़ा चले यह स्वार्थ की भक्ति है। ऐसी भक्ति आत्मा को परमात्मा की और नही ले जा सकती है।
सच्ची भक्ति नि:स्वार्थ भक्ति होती है, निस्वार्थ भक्ति से कर्मों की निर्जरा होती है। मीरा ने कृष्ण की, गौतम स्वामी ने महावीर स्वामी की, भक्त प्रह्लाद ने भगवान नगसिंग की भक्ति करी। ऐसे हजारों उदाहरण भक्ति के भरे पड़े है।
भक्ति में इतनी शक्ति है की भव ताप मिटाती है, भव सिंधु तिराती है, भक्त और भगवान में भेद न बचे वही सच्ची भक्ति है। थोड़ी भक्ति करो लेकिन नि:स्वार्थ भक्ति करो वही हमें तिरा सकती है।
शतावधानी पूज्याश्री गुरु कीर्ति ने फरमाया की जिनशाशन का हो जयकारा, खुल जाए पुण्य का पिटारा। यह ऐसा जिनशासन है जँहा अरबपति अरिहन्त बन गया, करोड़ पति केवली बन गया, ये वो शासन है जँहा लखपति चौरासी लाख जीवों से क्षमा मांग करके भव पार हो गया ।
कितने सालों से आप पर्युषण पर्व मना रहे हो ये तो आपको याद होगा लेकिन कोई ऐसा पर्युषण पर्व मनाया जिसे आपने प्रेक्टिकल के रूप में मनाया हो । 30 दिन में से 27 दिन आप डनलप की गादी पर सोए और 3 दिन चटाई पर सोकर देखो, 27 दिन बहुत खाया अब 3 दिन एकासन आयम्बिल उपवास करके देखो, अतिक्रमण बहुत किया अब प्रतिक्रमण करके देखो, बैंक में एफडी बहुत कर ली अब पुण्य की एफडी करके देखो।
माँ बच्चे को जन्म तो साथ में संस्कार को भी जन्म देती है, बच्चा संस्कार लेकर गर्भ से बाहर निकलता है। संस्कार की शुरुआत माँ के गर्भ से ही हो जाती है । जब बच्चा गर्भ में आता है तो माता पिता उसकी सुरक्षा और प्रॉटेक्शन करते है। गर्भवती होते ही माता को होटलों में जाना, फिल्में, टीवी देखना, मोबाइल देखना बन्द करना ही चाहिए, बच्चा गर्भ में वही संस्कार पाता है जो माँ के क्रिया कलाप रहते है।
भगवान महावीर गर्भ में आए तो त्रिशला ने अपने आप को बदल लिया। आप के घर में कोई बहु, बहन, बेटी गर्भवती है तो घर का माहौल बदलते हो या नही, यदि घर में तू तू मैं मैं का माहौल है तो आने वाला बच्चा निश्चित चिड़चिड़ा होगा। हम ये तो गर्व से कहते है की हमारी फैमेली एजुकेटेड है ग्रेजुएटेड है, लेकिन कोई ये कहता है की हमारी फैमेली संस्कारित है। एक पिता भले ही शराबी, जुआरी, गुंडा, बदमाश, मवाली हो लेकिन वो ये कभी नही चाहेगा की उसकी संतान उसके जैसी बने वो हमेशा यही चाहेगा की उसकी संतान संस्कारी हो। हमारा एक्शन ही हमारे बच्चे का रियेक्शन होगा, जब परिवार ही संस्कारित नही होंगे तो हमारी संतान कैसे संस्कारित हो सकती है। घर में लडकिया शार्ट कपड़े पहनती है तो क्या हम उससे कहते है की शार्ट कपड़े मत पहनो तुम्हारे छोटे भाई पर इसका क्या असर होगा। शार्ट कपड़े से फ्यूचर शार्ट और लांग कपड़े से फ्यूचर लांग होगा। हमारे आगम में जैन इतिहास में जितने भी महापुरुष हुए है उन्हें संस्कार घर से ही मिले है । मोबाइल तो गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपनी संतान को दे देता है वो कोई बड़ी बात नही संस्कार बच्चों को दो ये बड़ी बात है। गर्भ में संस्कार नही दे पाए कोई बात नही अभी भी देर नही हुई है, ग्रह संस्कार का वक्त अभी आपके पास है ग्रह संस्कार देकर अपने बच्चों का फ्यूचर ब्राइट करो।