प्रथम अध्याय : कर्म की सिद्धि

पर्दे के पीछे कौन ?
संकलनकर्ता : शैलेन्द्र कुमार जैन
334 , हाईलिंक सिटी , इन्दौर
MO. 9425413847, 7000154181

विश्व एक रंगमंच है। इस पर नाटक खेला जा रहा है। संसार की विविध आत्माएँ चित्र-विचित्र वेष धारण कर अपना पार्ट अदा कर रही हैं। इसी सन्दर्भ में प्रसिद्ध पाश्चात्य नाट्यकार शेक्सपियर ने भी “As you like it नाटक में चार पंक्तियाँ लिखी हैं
All the world’s a stage;
And all the men and women merely players;
They have their exits and their entrances;
And one man in his time plays many parts.
जो नाटक खेला जा रहा है वह हमारे सामने है परन्तु सब कुछ सामने नहीं है, कुछ पर्दै के पीछे भी है जो अभिनय पर्दे के पीछे की पृष्ठभूमि में हो रहा है यह बड़ा विचित्र है इसलिए यह विचारणीय भी है। उस पर्दे के पीछे रहे हुए कारण की खोज आन्तरिकता में प्रविष्ट होकर करनी होगी। जो अभिनय रूप आचरण किया जा रहा है उसके दो कारण हैं। एक है बाहरी कारण और दूसरा है भीतरी कारण बाहरी कारण बहुत स्पष्ट होते हैं। जैसे एक आदमी चला जा रहा है और रास्ते में आग जल रही है। आग के निकट आते ही वह अपना पैर खींच लेता है उसने अपना पैर क्यों खींचा? यदि वह पैर नहीं खींचता तो उसका पैर जल जाता। यह बाहरी कारण हमारी समझ में आ सकता है।
एक आदमी बीमार होने के कारण अस्वाभाविक प्रवृत्ति कर रहा है। यह उदास है, खिन्न है। उसकी बीमारी के पीछे जो कारण है वह बाहरी कारण नहीं है वह भीतरी कारण है, जिसकी खोज करनी होगी। जहाँ भीतरी कारण होता है वहाँ खोज का प्रश्न आता है और साथ-साथ विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत होते हैं जैसे रोग एक होता है पर उसके कारण की खोज में जाएँ तो विभिन्न चिकित्सक विभिन्न बातें प्रस्तुत करते हैं। वैद्य की दृष्टि में रोग का कारण शरीर के वात, पित्त और कफ की विकृति को बताया जाता है तो डॉक्टर की दृष्टि में Bacterial Infection है। यदि कोई ज्योतिष होगा तो वह कहेगा ग्रहों की गति विपरीत हो गई और एक्यूपंक्चर के विशेषज्ञ कहेंगे शरीर में विद्युत का सन्तुलन ठीक नहीं है। बीमारी एक ही है पर विचारधाराएँ भिन्न-भिन्न हैं। प्रश्न होता है हमारे बाह्य और आभ्यन्तर आचरण का मूल स्त्रोत क्या है? हम दूसरों के साथ अच्छा और बुरा व्यवहार क्यों करते हैं? हम गुस्सा क्यों करते हैं? हमारे भीतर ईर्ष्या की अग्नि क्यों जल उठती है? हम कड़वा क्यों बोलते हैं? हम प्रेम क्यों करते हैं? हमारा व्यवहार मानवता को छोड़कर रुखा, कठोर और अशिष्ट क्यों हो जाता है? हमें जीवन में पग-पग पर प्रतिकूलताएँ क्यों मिलती हैं? हमारी भावधारा निमित्तों से प्रभावित होकर क्यों बदल जाती हैं?
कहना होगा हमारे प्रत्येक आचरण का कारण अनादि है। अनादि कारण उसे कहते हैं जो अनादि से चला आ रहा है जिसका आदि-बिन्दु खोजना हमारे लिए संभव नहीं है परन्तु उसका अन्त किया जा सकता है। अतः अध्यात्म की साधना का प्रयोजन मात्र इतना है कि आचरण के पीछे हेतु है उसे खोज लिया जाए। हमारे आचरण की विसंगतियाँ जीवन में सन्तुलन, समरसता व एकरूप को खण्डित कर रही है। हमारे बहुत सारे दैनिक आचरण सादि सान्त होते हैं। उनकी आदि और अन्त दोनों साथ-साथ चलते हैं। जैसे सुबह उठते ही किसी कारण से क्रोध की आदि हुई और कुछ समय के बाद क्षमाशील बनने से उसका अन्त हुआ।
हम उस प्रवाह के बारे में सोचें जिसकी आदि का हमें कोई बोध नहीं है। जो अनादि से चला आ रहा है और उसका हेतु भी अनादि है। इस अनादि हेतु की खोज में कर्मशास्त्र की दिशा का अनावरण हुआ। कर्म सिद्धान्त में हमारे आचरणों की कार्य-कारणात्मक मीमांसा है।
आधुनिक मानस-शास्त्रियों ने आचरण के मूल स्त्रोतों का अनुसंधान करते हुए बताया कि मूलतः हमारे दो प्रकार के आचरण होते हैं, सहजात और अर्जित सहजात आचरण वह है जो मनुष्य को जन्म से मिलता है और अर्जित आचरण वह है जो विभिन्न वातावरण में अर्जित होता है। जो आचरण बार बार दोहराया जाता हैं वह आदत बन जाता है। सहजात प्रवृत्ति हो या अर्जित प्रवृत्ति हो, उसके पीछे कुछ न कुछ हेतु अवश्य होता है। एक गाय भी यदि जंगल में इधर-उधर घूम रही है तो उसके इस आचरण के पीछे भूख की स्वाभाविक वृत्ति काम करती है।
क्रमश:
कल का जबाब : सर्प
आज का सवाल : हमारे दो प्रकार के आचरण कौन – कौन से होते है ?