खुद करना होगा अपना काम, दूसरों के भरोसे नहीं पहुंच सकते मंजिल तक-समकितमुनिजी

  • संसार सागर से पार होने के लिए पाप का प्रत्याख्यान जरूरी
  • उत्तराध्ययन आगम की 27 दिवसीय आराधना का छठां दिन

तिभवन भीलवाड़ा (निलेश कांठेड़)। संसार सागर में लुप्त हो जाने वाले नादान एवं नासमझ लोगों के पास सभी तरह के दुःख पहुंचते है। धन, शरीर, यौवन जैसे अनित्य में नित्य की अनुभूति करने वाला नासमझ व नादान है एवं इनको सभी तरह के दुःख उपलब्ध होते है। सत्य की खोज खुद करनी है गुरू मार्ग बता सकता है लेकिन उस पर चलना स्वयं को पड़ेगा। ये विचार श्रमणसंघीय सलाहकार सुमतिप्रकाशजी म.सा. के सुशिष्य आगमज्ञाता, प्रज्ञामहर्षि डॉ. समकितमुनिजी म.सा. ने शांतिभवन में मंगलवार को परमात्मा भगवान महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन आगम की 27 दिवसीय आराधना ‘‘आपकी बात आपके साथ’’ के छठे दिन व्यक्त किए। छठे अध्याय क्षुल्लक निर्ग्रन्थीय एवं सातवें अध्ययन औरभ्रीय का वाचन करने के साथ इनके बारे में समझाया गया। उन्होंने कहा कि हमे दूसरों के भरोसे नहीं रहना है अपना कार्य खुद करना है। दूसरों के भरोसे रहने वाला कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सकता है। धन और बाहरी सामग्री कभी दुःखों से छुटकारा नहीं दिला सकती फिर भी हम इनको एकत्रित करने में जुटे रहते है। लगता हमे परमात्मा की वाणी पर भी विश्वास नहीं करते है। संसार सागर से पार होने के लिए पाप का प्रत्याख्यान जरूरी है। मुनिश्री ने कहा कि शब्दों से कभी आत्मा का समाधान नहीं हो सकता बस अपना काम निकाल सकते है। स्वयं को सजाने-संवारने में व्यस्त रहने वालों के लिए सभी तरह के दुःख उपलब्ध होते है। शरीर मेकअप के लिए नहीं कर्मो को क्षय करने के लिए मिला है। पूज्य समकितमुनिजी ने कहा कि मेकअप का मतलब जो है उसे छुपाना और जो नहीं है उसे दिखाना होता है। ऐसा करके हम मिथ्यात्व में उलझ रहे है। धर्म को अधर्म कहना या अधर्म को धर्म कहना मिथ्यात्व है। जो नहीं है उसे दिखाने का प्रयास करने वाला सभी प्रकार के दुःखों को उपलब्ध रहता है। शुरू में गायन कुशल जयवंतमुनिजी म.सा. ने प्रेरक गीत प्रस्तुत किया। प्रेरणाकुशल भवान्तमुनिजी म.सा. का भी सानिध्य मिला। लक्की ड्रॉ के माध्यम से तीन-तीन भाग्यशाली श्रावक-श्राविकाओं को प्रभावना में चांदी के सिक्के लाभार्थी परिवारों द्वारा प्रदान किए गए। धर्मसभा का संचालन शांतिभवन श्रीसंघ के मंत्री राजेन्द्र सुराना ने किया।
दुनिया बड़ी स्वार्थी मुंह देख करती तिलक
पूज्य समकितमुनिजी ने कहा कि ये दुनिया बड़ी स्वार्थी है और इंसान का मुंह देख तिलक करने वाली है। दुनिया में फ्री में कुछ नहीं देती है, फ्री में दे रही है तो समझ लेना भविष्य में ब्याज सहित वसूली की तैयारी है। जो सुविधा लेंगे उसके परिणाम सामने आएंगे ही। बलि का बकरा नहीं बनना है तो हरी घास खाना छोड़ दो। मुनिश्री ने कहा कि केवल तीर्थंकर परमात्मा ही है जो दुनिया में निःस्वार्थ है। दुनिया किसी की प्रशंसा भी करती है तो कीमत वसूलती है। हमने किसी से 100 बार प्रेम से बोला और एक बार गाली निकल गई तो वह सौ बार का प्रेम भूल एक बार की गाली को ही याद रखेगा जबकि इसकी अनदेखी करदे तो प्रेम कायम रहेगा।
पाने के चक्कर में मिले हुए का लाभ भी नहीं लेते
मुनिश्री ने कहा कि हम कुछ पाने के चक्कर में जो मिला हुआ है उसका भी लाभ नहीं ले पाते है। हम उसके पीछे भागते है जो पास में नहीं है। जो मिला हुआ है उसकी कीमत समझ नहीं आती है। जिंदगी में जो मिला हुआ वह तो नहीं खोना चाहिए। मानव जीवन का मौल पहचानना होगा। इसे गंवाने पर तिर्यंच गति, इसमें लाभ जोड़ने पर देव गति और इसमें कर्म चढ़ाने पर नरक गति मिलती है। हमारा लक्ष्य इसमें लाभ जोड़ना होना चाहिए न कि कर्म बढ़ाकर मूल पूंजी को भी गंवा दे। दान-पुण्य करने से आत्मा लाभ में रहेगी।