दिवाकर वाणी
(संदर्भ – जैन दिवाकर ज्योतिपुंज खंड -4/229)
रचयिता – जैन दिवाकर पू. श्री चौथमलजी महाराज साहब
स्वर /प्रस्तुति :सुरेंद्र मारू इंदौर

तुम पुण्य का उपार्जन करना चाहते हो तो इसका सुगम से सुगम साधन संतों के गुणों का उत्कीर्तन करना है। द्रवित अंत:करण से संतों के गुणगान करो। इससे तुम्हारे पापों का क्षय होगा और पुण्य प्रकट होगा।अपने इस बाइस संप्रदाय में अनेक पुण्यशाली संत महात्मा हो चुके हैं। उनका त्याग और तप उच्च कोटि का था। अपने दादा गुरु पूज्य श्री हुक्मीचंदजी म. का छंद जिसे जैन दिवाकर जी ने स्वयं रचा है। 01.01.1949 :पाली के प्रवचन में इस विषय का उल्लेख किया है, आपके समक्ष सादर प्रस्तुत कर रहा हूं।