साभार : जैन दिवाकर ज्योति पुंज खंड-4/235,240,241
प्रवचांश: 01.01.1949, पाली
प्रवचनकार : जैन दिवाकर पू गुरुदेव श्री चौथमलजी म.सा.
प्रस्तुति : सुरेन्द्र मारू, इंदौर
भाइयों ! जिसमें गुण होते हैं वही पूजा का पात्र होता है, उसी की प्रशंसा होती है, उसका ही आदर सम्मान किया जाता है। कालिदास ने कहा है :-
गुणा पूजास्थानं गुणिषु न च लिडगं न च वय:।
अर्थात – गुण पूजा के पात्र होते हैं, न वेष पूजाता है और न उम्र पुजाती है। मनुष्य की प्रतिष्ठा और महिमा का आधार उसके गुण ही हैं। जिसमें गुणों के बदले दोष होते हैं, वह निंदा का पात्र बनता है और उसकी बदनामी होती है, अपयश होता है। गुणों में एक ऐसी अदभुत आकर्षण शक्ति होती है कि वे अनायास ही दूसरों के हृदय को अपनी ओर खींच लेते हैं। गुणी मनुष्य अगर किसी का शत्रु हो तो भी वह उसकी प्रशंसा करता है। वास्तव में गुणों की विशेषता यही है कि वे अपने विरोधी से भी प्रशंसा करवा लेते हैं और शत्रु के हृदय में भी अपना स्थान बना लेते हैं। इतिहास के जानकारों को भलीभांति मालूम है कि बादशाह अकबर के लिए महाराणा प्रताप सिर दर्द बने हुए थे। भारतवर्ष में अगर कोई अकबर का प्रबल से प्रबल विरोधी था तो वह प्रताप ही थे,मगर अन्य राजाओं की अपेक्षा अकबर प्रताप का सबसे अधिक आदर करता था। ठीक ही कहा गया है- गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवंति
अर्थात-गुणज्ञजनों के लिए ही गुण, गुण होते हैं। गुणों की कद्र गुणवान ही करता है। जो गुणों की पहचान नहीं कर सकता,वह गुणी का आदर भी नहीं करता।
अगर मनुष्य में गुण हैं तो वे अपने आप ही विकसित हो जाएंगे। कस्तूरी में सुगंध है तो क्या वह आप ही आप प्रकट नहीं हो जाती? कस्तूरी में गंध की विद्यमानता के लिए शपथ खाने की आवश्यकता नहीं होती। इसी प्रकार गुणों को प्रकट करने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता। अतएव हे गुणवान! तू चिंता मत कर। यह न समझ कि मेरे गुणों का कोई ग्राहक नहीं है तो वे गुण निरर्थक ही हो गए। तेरे गुण तेरे कल्याण के लिए हैं। उन से तेरी आत्मा ऊंची उठेगी, पवित्र होगी और तुझे जीवन में शांति प्राप्त होगी। कोई तेरे गुणों की कद्र करता है तो करे और नहीं करता है तो न करे। इससे तेरा क्या बनता – बिगड़ता है? निर्जन वन में विकसित होने वाला कुसुम अपनी नैसर्गिक छटा से सुशोभित होता है और अपने शुचितर सौरभ को दिगमंडल में परिव्याप्त करता है । क्या उसने भी चिंता की है कि – मुझे गुणग्राहक नहीं मिला ? नहीं वह ऐसी चिंता नहीं करता। कोई प्रशंसक हो या न हो , उसका स्वभाव खिलना है और सौरभ को बिखेरना है। वह खिलेगा, वह मुस्कराएगा और अपनी महक को प्रसृत करने में किंचित भी कमी नहीं करेगा। इसी प्रकार तुम भी अपने जीवन के सुमन को विकसित होने दो, सद्गुणों के सौरभ से संपन्न बनने दो। तुम्हारे गुण तुम्हारे कल्याण के लिए ही हैं। उनसे कोई लाभ उठाता हो तो भले उठाए, नहीं उठाता है तो भी उन्हें निरर्थक न समझो। यही नहीं अगर कोई खल (दुर्जन) तुम्हारे गुणों में दोषों का आरोप करता है, तुम्हारी उदारता को उड़ाऊपन कहता है, तुम्हारे संतोष को कायरता या साहसहीनता कहता है, तुम्हारे ब्रह्मचर्य को नपुंसकता बतलाता है, तुम्हारे साहस को हेकड़ी मानता है और इस प्रकार प्रत्येक गुण को अवगुण के रूप में प्रकट करता है तो भी तुम चिंता न करो। सच्चाई सूर्य के समान है जो मिथ्या के मेघो में सदा के लिए छिपने को नहीं है। वह तो अंतत: प्रकट होने को ही है। सीता के सतीत्व पर कलंक लगाया गया था किंतु क्या वह कलंक अंत तक स्थिर रह सका? नहीं। वह आग को पानी बनाकर प्रकट हो गया और आखिर उस सती को कलंक लगाने वाले ही कलंकित हुए।
भाइयों! स्मरण रखो गुण गुण ही रहेंगे और दोष दोष ही रहेंगे। गुणों को दोष बताने वाले व्यर्थ कर्मबंध कर लेंगे। तुम्हारे पास जो गुण हैं, उन्हें तुम विकसित करते चलो और गुणी जनों के गुण ग्रहण करते रहो। गुण ग्रहण करते समय यह न देखो कि गुणवान किस स्थिति का है और किस जाति का है? जिसमें गुण है वह किसी भी जाति का हो और कितनी ही गई बीती स्थिति में हो, श्रेष्ठ है, आदरणीय हैं और उसके गुण ग्रहण करने योग्य है।