अजैन भक्तो का गुरु जैन दिवाकर श्री चौथमल जी म.सा के प्रति अन्तः करण – से श्रद्धा व आत्मीय प्रेम

प्रस्तुति : विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा ( पूणे)

यह तो सर्व विदित है कि जैन दिवाकर जी महाराज के प्रवचनो में 36 ही कोम के लोग आते थे तथा वे केवल प्रवचन ही नही सुनते अपना जीवन भी परिवर्तन करते थे एसे सहस्त्रो उदाहरण हे ! पर गुरुदेव के प्रति जो उनका समर्पण भाव था तथा मुनि श्री हर व्यक्ति का कैसे ध्यान रखते थे इस महान गुण के कारण वह इतने जनप्रिय बने! उसके कुछ संस्मरण आपके सामने रख रहा हूं!
गुरु आत्मा के साक्षी
इन्दोर चातुर्मास में एक स्वर्णकार बन्धु नियमित रुप से गुरुदेव श्री जैन दिवाकर जी महाराज का व्याख्यान सुनता था ! बहुत प्रेमी हो गया! वह एक दिन बोला – महाराज साहब ! मुज गरीब के घर भी गोचरी पधारो !
, गुरुदेव ठहरे पूरे समता योगी! स्वर्णकार बन्धु की भावना पर स्वयम उसके घर पधारे ! बादाम का हलुवा बना रखा था! गुरुदेव ने उसकी परिस्थिती देखी! गरीबी व अभाव की स्थिती में बदाम का हलुआ! समज गये इस व्यक्ति ने भक्तिवश हमारे लिये ही बनाया होगा !
पूछा
आज कोइ महमान आरहे हे ?
नंही महाराज! आज कोइ त्यौहार हे? नही महाराज!
तो फिर बदाम का हलुआ किस लिये बनाया हे ? स्वर्णकार बन्धु ने सकुचाते हुए उत्तर दिया- गुरु महाराज! आप जैसे महापुरुष पधारे है! यह तो आपकी सेवा ……!
पास ही ज्वार की रोटी रखी थी! गुरुदेव ने पूंछा यह रोटी किसके लिये हे?
हमारे लिये बापजी! स्वर्णकार बन्धु ने कहा!
तो आधी रोटी इसमें से हमारे लिये देदो !
आप हमारे गुरु महाराज है आपको ज्वार की रोटी केसे दूं! आप तो कृपा करके हलुआ लिजिए! स्वर्णकार भाइ ने बहुत ही विनय भाव से अर्ज किया!
नही हलुआ हमारे काम का नहीं , रोटी हमारे काम की हे! जो चीज तुम्हारे अपने लिये हे गुरु को उसी में से देना चाहिये! गुरु मेहमान नही, आत्मा के साक्षी हे….! स्वर्णकार बन्धु की आंखो से आनन्द के आंसु टपक पड़े! भक्ति विहल होकर ज्वार की आधी रोटी गुरुदेव को बहरा कर वह आनन्द के सागर में डूब गया !
वो सोचने लगा धन्य हे यह गुरु वर जो हजारो की भीड़ में मेरी विनती सुनकर मेरे घर पधारे ! उसका पुरा परिवार गुरुदेव का अनन्य भक्त बन गया !
( उपाध्याय श्री केवल मुनि जी द्वारा प्रकाशित संस्मरण)
बोगी रिजर्व करदी हे !
उदयपुर प्रवास में वंहा के स्टेशन मास्टर की धर्मपत्नी श्री जैन दिवाकर जी महाराज के व्याख्यान सुनने आती थी! एक दिन स्टेशन मास्टर भी आये ! उन्हे पता लगा कि महाराज साहब यंहा से अमुक दिन प्रस्थान / विहार करके चितौड़ की तरफ जाएगें !
एक अन्य दिन दोपहर के समय स्टेशन मास्टर पुनः आये और निवेदन किया, स्वामी जी! यंहा से चितौड़ के लिये एक डिब्बा ( बोगी) आपके और आपके शिष्यो के लिये मैने रिजर्व करा दिया हे , आप आनन्द से जाइये! आगे का प्रबन्ध भी हो जाएगा !
इस पर गुरुदेव ने उन्हे कहा- हम किसी प्रकार की सवारी नही करते, पैरो में जूती का प्रयोग भी नही करते! पैदल व नगें पांवो ही पुरे देश का भ्रमण करते है ! यह सुनकर स्टेशन मास्टर को बड़ा आश्चर्य हुआ और मुनि श्री के तप व त्याग से इतना प्रभावित हुआ और निवेदन किया कि घर पर गोचरी के लिये प्रार्थना की व घर पर ले गया ! उसकी धर्मपत्नी ने आरती सजा रखी थी! गुरुदेव के पंहुचते ही स्वागत करने के लिये आरती उतारने और स्टेशन मास्टर रुपयों की वर्षा करने सामने आये! गुरुदेव ने उन्हे तत्काल रोका और समजाया – हमारा स्वागत करना हो तो त्याग की आरती और भक्ति तथा श्रद्धा के साथ जीवन में कुछ न कुछ सतसंकल्प लेने के रुपयो की वर्षा कीजिए!
इस पर स्टेशन मास्टर ने और उसकी पत्नी ने अभक्ष्य पदार्थों के सेवन करने के प्रात्याख्यान लिये और अपने को धन्य माना!
( उपाध्याय श्री केवल मुनि जी द्वारा प्रकाशित संस्मरण)
त्याग की भेंट दिजीये
एक बार श्री जैन दिवाकर जी महाराज , उदयपुर महाराणा साहब के निवेदन पर राजमहल में प्रवचन करने पधारे ! प्रवचन में महारानी साहिबा भी भाव विभोर होकर प्रवचन सुन रही थी! प्रवचन समाप्ती पर महारानी जी ने चांदी की थाली में चांदी के सिक्के भरकर गुरुदेव श्री को भेंट भेजी! गुरुदेव श्री ने पूछा- यह क्या, क्यों?
यह महारानी जी साहिबा की तरफ से छोटी सी भेंट स्वीकारें! इस पर गुरुदेव ने स्मित मुद्रा में कहा- हम साधु अपरिग्रही हे, एसी भेंट नंही लेते! भेंट देनी हो तो अवश्य लेगें , पर त्याग व्रत की ! न्याय की थाली में व्रतो के रुपये रख कर दीजिए, हमें वही भेंट चाहिये!
( उपाध्याय श्री केवल मुनि जी द्वारा प्रकाशित संस्मरण के आधार पर)
एसे संस्मरणो से गुरुदेव का पुरा जीवन भरा हे ! कुछ लिपिबद्ध हे कुछ प्रकाशित नही हो पाए .!
यह सब घटनाएं सुनकर होठो पर यह गीत आजाता हे!
तुमने धर्म की शान बढ़ाइ
शुद्ध प्रेम की ज्योती जगाइ
करके जगमें सफर , पाया नाम अमर
सबने माना
मोंहे सपने में दर्श दिखाना
जैन जगके रतन तुम बिन तरसे नयन ना भुलाना
मोहे सपने में दर्श दिखाना
गुरु कृपा सदैव बरसती रहे !