साभार:जैन दिवाकर ज्योतिपुंज खंड 4/ 253 प्रवचानांश:पू. श्री चौथमलजी म.सा.
प्रस्तुति : सुरेंद्र मारू इंदौर
जस्सन्तिए धम्मपयाइं सिक्खे। तस्सन्तियए वेयणियं पउंजे।।
अर्थात – जिसके पास से धर्म के पद सीखें अथवा धर्म- शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करें, उसके प्रति विनय का प्रयोग करें।
कई लोग अपने आप शास्त्र बांच लेते हैं और व्याख्यान देने लगते हैं, कोई बात समझ में नहीं आती तो कह देते हैं – आचार्यों ने यों ही लिख मारा है। जो उनकी मर्जी हुई, लिख दिया। कई लोग तो केवलियों की निंदा करने से भी नहीं चूकते। ऐसे निंद कों का कल्याण नहीं हो सकता। चार अंगुल का तिनका लेकर कोई जंबू दीप को नापना चाहे तो क्या नप सकता है? लेकिन बिगड़ी खोपड़ी के लोग अपनी कमजोरी को महसूस नहीं करते। पूज्य उदयसागरजी महाराज कहते थे कि केवलियों के वचन सम्राट के दुशाले के समान हैं। बुद्धिमत्ता से प्रयोग करने पर वह शोभा बढ़ाते हैं और खींचतान करने से तार – तार बिखर जाते हैं। इसलिए भाइयों! केवलियों के वचन में कभी खींचतान न करो, उनकी अविनय-आसातना मत करो। नहीं तो अनंत काल तक मनुष्य जन्म पाना भी कठिन हो जाएगा।