मालव केशरी , पूज्य श्री सौभाग्य मल जी म.सा के 126 वे जन्म जयन्ती पर विशेष : श्रमण संघ निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले समन्वयवादी संत थे मालव केशरी जी

प्रस्तुति : विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा

वैसे तो रतलाम ( रत्नपुरी) स्थानक वासी परम्परा मे महान सन्तो को देने वाली भूमि रही जंहा पर अखण्ड यशधारी आचार्य प्रवर श्री मन्नालाल जी म.सा कवि वर पूज्य श्री तिलोक रिषी जी म.सा , उपाध्याय श्री प्यारचंद जी म.सा जैसे सन्तो की जन्म स्थली रही और जगत् वल्लभ जैन दिवाकर गुरुदेव श्री चौथमल जी म.सा की प्रमुख कर्म स्थली रही ।
एक समय एसा था जब श्रमण संघ की दो महान विभूतिये रतलाम में स्थिर वास थी व श्रमण संघ की दो सम्प्रदायो में परस्पर कैसा प्रेम हो उसका उदाहरण वंहा देखने को मिलता था एक थे ज्योतिषाचार्य उपाध्याय मालव रत्न गुरुदेव श्री कस्तुर चंदजी म.सा जो कि नीमचौक स्थानक में विराजमान थे दुसरे थे मालव केशरी पूज्य गुरुदेव श्री सोभाग्य मल जी म.सा उस समय नोलाइपुरा में विराजमान थे, रत्नपुरी एक तीर्थ स्थल बनी हुई थी जो भी जाता दोनो सन्तो के दर्शन कर धन्य हो जाता दोनो सन्त सम्प्रदायो के मालिक व आपस में एसा प्रेम जो बड़ी मुश्किल से देखने में नजर आता है ।
मालव केसरी जी का जीवन वृत पढ़ते हे तो एसा लगता है कि महानता कही छुपी हुई नही रहती ।
संवत 1953 के महासुदी अष्ठमी को फाफरिया परिवार सरवानिया ( नीमच)मे माता केसर बाइ की कुक्षी से जन्म लिया पिता चौथमल जी फाफरिया थे दो वर्ष की उम्र मे माताजी का देहावसान एवम तीन वर्ष की उम्र में रतलाम मे पिताजी का देहावसान पूर्व भव के संयोग खाचरोद के खिवसरा परिवार मे पुत्र सम पालनपोषण हुआ विचित्र संयोग रहा! वैराग्य उदय हुआ एवम साढ़े तेरह वर्ष की उम्र में संवत 1967 की वैशाख कृष्ण तृतीया को महाराष्ट्र मंत्री श्री किशन लाल जी म.सा के पास भागवती दीक्षा ग्रहण की एवम गुरुकृपा से एसा विस्तृत अध्ययन किया तथा प्रवचन शेली विकसीत की कि प्रसिद्ध वक्ता की उपाधी मिली तथा जंहा भी विचरण किया प्रेम की गंगा बहाई अपने 74 साल के दीक्षा पर्याय में खुब धर्म प्रभावना की तथा मन में हमेशा यह भावना रखी कि संघ में एक्यता हो श्रमण संघ मजबूत बने ।
उस समय के आचार्यो व प्रमुख सन्तो से आपके मधुर संबंध रहे लगभग 87 वर्ष की उम्र में रतलाम में संवत 2041 की श्रावण बुदी नवमी तदनुसार 22 जुलाई 1984 को आपका देवलोक गमन हुआ ।
मे भी सोभाग्य शाली रहा कि उनके कई बार दर्शन करने का सोभाग्य प्राप्त हुआ प्रथम दर्शन 1 जनवरी 1964 को निम्बाहेड़ा में आचार्य सम्राट आनंद रिषी जी म.सा के साथ अजमेर साधु सम्मेलन में जाते समय पधारे में बहुत छोटा बालक था ।
उसके बाद कई बार दर्शन हुए
जैन दिवाकर जन्म शताब्दी के पावन प्रसंग पर उनका कवि केवल मुनि जी के साथ संयुक्त चातुर्मास सन 1977 मे हुआ जो कि इन्दोर महावीर भवन में हुआ वोभी कभी भुलाया नही जासकता एसे समन्वय वादी महानसन्त के पावन जन्म जयन्ती पर अनेकानेक वंदन हार्दिक श्रद्धा सुमन ।

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