प्रस्तुति : विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा( पूणे)

जैन दिवाकर जी महाराज के उपदेशो से समाज के सभी वर्ग प्रभावित हुए , जीवन में परिवर्तन किया उसमें कई वेश्याए भी थी जिन्होने अपने जीवन को बदल दिया!
दैहिक व्यापार समाज की शुद्ध , पवित्र संस्कृति के लिये एक कलकं हे! मात्र धन के लिये तन का सौदा एक भारतीय- नारी के लिये कितना मंहगा होता हे! योवन का उपयोग वासना के लिये नही उपासना के लिये हे! नारी के लिये पति परमेश्वर होता हे किन्तु प्रतिदिन के नवीन- पुरुष, मात्र स्वार्थ पूर्ति के साधन होते हैं! प्यार व निःस्वार्थ प्रेम का स्थान दैहिक व्यापार नही ले सकता! दिवाकर जी महाराज के उस युग में वैश्या – गमन तथा साथ ही वैश्या नृत्य का काफी प्रचलन था! दिवाकर जी महाराज ने सोचा- नारी का अंग प्रदर्शन का विषय नही हे! नारी का स्थान पूज्य हे ओर उसका बीच- बाजार में पुरुषो की वासना युक्त नजरो के बीच प्रस्तुत होना उचित नही! अतः दिवाकर जी महाराज ने इसे प्रवचन का एक अंग बनाया!
जहाजपुर में प्रवचन का प्रभाव
विक्रम संवत 1969 में जहाजपुर( राजस्थान) पंहुचे! वंहा प्रवचन में विवाह के अवसरो पर वैश्या – नृत्य की कुप्रथा पर कठोर प्रहार किया! जैन एवम वैष्णवो ने वैश्या नृत्य की कुरुती को सदा सदा के लिये त्याग दिया! यह निर्णय सुन कर वैश्याए हतप्रभ हो गई! जीवन निर्वाह का साधन यों लूटते देख परेशान हो उठी ! एक दिन उन्होंने एकत्रित होकर साहस बटोर कर नगर के बाहर की ओर जाते हुए दिवाकर जी महाराज का मार्ग रोक कर कहा- महाराज! तुमने हमारी आजिविका का साधन छीन लिया अब हमारा निर्वाह कैसे होगा ? दिवाकर जी महाराज ने समजाया :-
बहनो! नारी जाती का पद बहुत ही गौरवपूर्ण हे! वह ममतामयी माता और स्नेहशीला बहन हे, प्यार स्वरूपा पत्नी है! तुमने इतना महत्वपूर्ण पद पाया हे! यह कुत्सित कर्म और नृत्य गान तुम्हारे लिये उचित नही हे, नारी के माथे पर कलंक हे! सदाचरण और सात्विक वृत्ति से इस कलंक को धो डालो! मेहनत और मजदूरी से पेट का पालन हो सकता हे! धार्मिक व सात्विक जीवन व्यतीत करो!
इस उद्बोधन से प्रभावित होकर वेश्याओ ने सात्विक जीवन जीने का संकल्प किया!
*संवत 1980 में पाली की वेश्याओं पर प्रवचन का प्रभाव
वंहा की मंगली व बनी नाम की वेश्याओ ने आजीवन वेश्यावृत्ति को त्याग कर शील धर्म को स्वीकार किया तथा सिणगारी नाम की वेश्या ने एक पति- व्रत धर्म स्वीकार किया! *संवत 2005 में जोधपुर वर्षावास में प्रवचन का जबरदस्त प्रभाव
संवत 2005 में मुनि श्री के जोधपुर चातुर्मास में कई वेश्याओ ने प्रवचन सुनकर अनेक वेश्याओ ने इस घृणित- कार्य को त्याग कर महान – धर्म अपनाया! तथा कतिपय वेश्याओ ने मर्यादा निश्चित की! अनेक वेश्याओ ने यह प्रतिज्ञा ली कि हम अपनी कन्याओ को इस पेशे में नही डालकर उनका विवाह कर देगें!
वेश्यावर्ग की सर्वथा उपेक्षा ओर तिरस्कार करना ओर भी घातक है किन्तु उन्हे यथार्थता का बोध कराकर सन्मार्ग पर लाना ही लाभप्रद सिद्ध होता है और यही मार्ग अपनाया था दिवाकर जी महाराज ने!
कइ वेश्याए दिवाकर जी महाराज की अनन्य भक्त बन गइ व नियमित रूप से प्रवचन में आती , संघ वालो ने उनके बैठने की अलग से व्यवस्था की भूतपूर्व नगरवधु हजारी बाइ ने जब गुरुदेव के देवलोक गमन का समाचार सुना तो वो भाव विहल हो गइ ओर श्रद्धाजंली में यह पंक्तियां प्रस्तुत की मेरे थे गुरुदेव तुम्ही, मेरी थी शक्ति
तुम्ही मेरे माता- पिता, अन्तर की भक्ति
तुम्ही को मेने ब्रह्मा और विष्णू जाना
तुम ही को मेने अखिल विश्व में सच्चा माना
तुम ही थे आराध्य, तुम्ही मेरे प्राण
तुम ही से मुझको मिला है जीवन – दान
( साभार: डा. सुशील जी म.सा द्वारा लिखीत शोध ग्रन्थ , जैन दिवाकर मुनि श्री चौथमल जी महाराज और उनका हिन्दी साहित्य)
संतो को आश्चर्य
एक साल जोधपुर में प. रत्न श्री शुक्ल चंद जी म.सा प. हरोश चन्द्र जी महाराज आदि सन्तो का चातुर्मास था! व्याख्यान स्थल अलग था व ठहरने का स्थान अलग ! व्याख्यान स्थल पर कुछ मुनि प. शुक्ल चन्द जी म.सा. के साथ जाते और अन्य मुनिगण ठहरने के स्थान पर ही रहते थे! व्याख्यान समाप्ती के बाद कुछ भाइ – बाहिन मुनियो के दर्शन हेतु , ठहरने के स्थान आते थे! व्याख्यान के बाद प्रतिदिन एक बहिन सफ़ेद साड़ी पहन कर आती थी और बड़े भक्ति भाव से तीन बार झुक कर सभी मुनियों को नमन करती थी! एक दिन प. हरिश चन्द जी महाराज ने पूंछा: तुम व्याख्यान सुनने व दर्शन करने आती हो , श्रावक जी नही आते? इस पर पास खड़े श्री शिव नारायण जी नाहटा ने कहा- महाराज इनके पति नही है! क्यों क्या हुआ? महाराज, यह पारियात ( हिन्दु वैश्या ) है! इनके पति नही होते है और होते तो अनेक! गुरुदेव श्री जैन दिवाकर जी म. के व्याख्यान सुनने मे बाद इस बहिन ने रंगीन वस्त्र त्याग दिये हे! अब सफेद वस्त्र पहनती हे और ब्रहमचर्य व्रत का पालन करती हे! महाराज के उपदेश से इनकी जाती की अनेक बहिनो ने वेश्याव्रती छोड़ कर शादी करली हे! यह सुनकर इस काया पलट पर श्री हरीश चन्द जी महाराज म. को बहुत आश्चर्य हुआ और जैन दिवाकर जी महाराज के प्रभाव को जानकर दंग रह गये कि जैसा उनके बारे में सुनते थे प्रत्यक्ष देख लिया !
जिस प्रकार स्थूल भद्र मुनि ने रुपकोषा के जीवन को परिवर्तित किया , उस ही तरह श्री जैन दिवाकर जी महाराज ने अनेक वेश्याओं का उद्धार किया था !
( साभार महामानवता वादी युग पुरुष सन्त में तपस्वी श्री लाभ चन्द जी म.सा द्वारा प्रेषित संस्मरण)
धन्य हे गुरुदेव ! इन सब बातो को सुन कर गुरुदेव के प्रशिष्य , शतावधानी कवि श्री अशोक मुनि जी के लिखे गीत की वो पंक्तियां याद आजाती हे!
गुरुदेव तुम पर बलि बलि जाए
तुमने अनेको के जीवन बचाए, जीवन बनाए*
गुरु कृपा सदा बनी रहे !