गुरुवाणी – अहंकार को श्रेष्ठ मानना

गुरु भक्त – सुधीर हरबंस लाल जैन, कोटा, (राजस्थान)

अपने अहंकार को श्रेष्ठ, मानना और अपनी इच्छाओं की उचित, अनुचित, किसी भी तरह से पूर्ति करने को ही पाप माना गया है।
अपनी अच्छी-बुरी भावनाओं के अनुसार ही जीवन में क्रियाशीलता उत्पन्न होती है । जो सोचते हैं वही करते हैं, इसी के अनुरूप अच्छे-बुरे कर्मों का दंड या पुरस्कार मिलता है । कर्म का महत्व जो जी में आये करने से नहीं होता, वरन् उसके भले या बुरे प्रतिफल से होता है । आम का पेड़ लगाना या बबूल बोना दोनों क्रियाएँ एक जैसी हैं। शक्ति उद्यम व साधन दोनों को एक समान ही जुटाने पड़ते हैं । किंतु आम रोपने का प्रतिफल सुंदर स्वाद युक्त फल, सुखद घनी छाया है और बबूल से न तो छाँव मिलती है न मीठे फल । काँटे बिखेर कर दूसरों को दु:ख-पीड़ा पहुँचाने का अपकार ही बबूल से बन सकता था । इसके लिए उसकी सर्वत्र निंदा व भर्त्सना ही की जाती है
मनुष्य स्वत:अच्छा या बुरा नहीं है । यह ढलाव तो विचारों के साँचे में होता है । गीली मिट्टी को विभिन्न प्रकार के साँचे में दबाकर भाँति-भाँति के खिलौने बनाते हैं । विचारों के साँचे में व्यक्ति का निर्माण होता है । दूषित स्वार्थपूर्ण विचारों से मनुष्य हीन बनता है ।
बुरे विचारों की कीचड़ में फँसा हुआ व्यक्ति अपना प्रभाव खो देता है* । यद्यपि उसकी नैसर्गिक पवित्रता नष्ट नहीं हुई, उसकी शक्ति ज्यों की त्यों बनी हुई है, किंतु मान गिर गया, कीमत गिर गई ।
दूसरों से प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, सहयोग और सहानुभूति की अपेक्षा सभी रखते हैं, पर जब व्यावहारिक रूप में हम दूसरों के साथ ऐसा बर्ताव नहीं करते तो इसे कुविचार माना जाता है । *अपने “अहंकार” को “श्रेष्ठ” मानना और अपनी इच्छाओं की उचित अनुचित किसी भी तरह की पूर्ति करने को ही “पाप” माना गया है । अपकार को पाप कहते हैं । क्योंकि यह दुर्भावनाओं के कारण होता है । “परोपकार” पुण्य है, क्योंकि यह “सद्भावना” का प्रतीक है।
गुरुदेव की सीख है कि मंगलमय कामनाएँ
“पुण्य” और स्वार्थपूर्ण भावनाओं को ही “पाप” कहा जा सकता है ।