प्रस्तुति – विजय कुमार लोढ़ा
उपाध्यक्ष – अ. भा. श्वे. स्था. जैन कांफ्रेस ज्ञान प्रकाश योजना नइ दिल्ली
मंत्री – जैन दिवाकर साहित्य प्रकाशन समिती चितौडग़ढ़( राज.)

पुरे देश में वितराग वाणी का प्रचार कर प्रेम व बन्धुत्व के उपदेशक एवम गुरु के नाम पर समर्पित उपाध्याय श्री केवल मुनि जी का जन्म राजस्थान के गांव कोशीथल जिला भीलवाड़ा में संवत 1970 की श्रावण कृष्णा त्रयोदशी के दिन हुआ आपके पिताजी का नाम श्री जवाहर लाल जी कोठारी व माता का नाम कंकु बाइ था आपका जन्म नाम प्यार चंद व आपके एक लघु भ्राता थे उनका नाम वक्तावर मल था
आपकी ,आपके लघु , भ्राता एवम मातुश्री की भागवती दीक्षा जैन दिवाकर गुरुदेव श्री चौथमल जी म.सा के पावन सानिध्य में संवत 1981 के फाल्गुन शुक्ला पंचमी को ब्यावर में सम्पन्न हुई
आप का नाम केवल मुनि व लघु भ्राता बंशी मुनि के नाम से जाने गये मातुश्री बहुत ही तपस्वीनी महासती बनी जो महासती श्री कंकु जी के नाम से प्रसिद्ध हुई!
दीक्षा लेकर ज्ञान सीखने में इतनी रुचि रखी कि स्थानकवासी परम्परा में एसे सृजनधर्मी बहु आयामी विरल व्यक्तित्व के धनी बने तथा साहित्य की महक को आम मानस तक पंहुचाने का प्रयत्न किया !
यश के शिखर पर पहुंच कर भी जो कुछ पाया गुरु चरणों की कृपा माना लोक धुन व फिल्मी धुनो पर एसे धार्मिक, सामाजिक व उदबोधन एवम भक्ति गीतो की रचना की जो एक बार सुन लेता मंत्र मुग्ध हो जाता !
गध्य व पध्य दोनो विधाओं के लेखक
उन पर मां शारदे की एसी कृपा थी कि बहत कम वय में उन्होंने कविता एवम गीत लिखने प्रारंभ किये! उस दौर में कवि जी के नाम से दो सन्त प्रसिद्ध थे एक उपाध्याय कवि अमर मुनि व कवि रत्न श्री केवल मुनि जी , जिनकी रचनाए कही लोग गुन गुनाते थे तथा सन्त- सती वर्ग अपनी प्रवचन सभाओ में सुनाते थे ! जीवन के अन्तिम वर्षो में उन्होंने कविता लिखना कम व गध्य लेखन में ज्यादा समय दिया!
धार्मिक उपन्यास
आगम में आने वाली कथाओं व अन्य धार्मिक कहानियों का उपन्यास के रूप में प्रकाशन करा के एक नइ विधा प्रस्तुत की कितने ही उपन्यास उन्होने लिखे वे बहुत ही पोपुलर हुए! बहुश्रुत उपाध्याय श्री केवल मुनि जी द्वारा अनुवादित तत्वार्थ सूत्र व आगम मुक्ता आज भी स्वाध्यायी बन्धुओं के लिये बहुत उपयोगी हे !
उपाध्याय श्री द्वारा रचित प्रमुख गीतो में – 1 हो जिन शासन के ताज गुरु महाराज बड़े उपकारी, 2 जैन दिवाकर गुरुदेव ज्योतिमान थे बड़े पुण्यावान थे!, 3 दिवाकर उस पार हे छाया अन्धकार हे!, 4 दर्शन प्यासी अंखिया हे कहा ढूंढे कहा जाए
( यह सब गीत उन्होंने जैन दिवाकर गुरुदेव के गुण-गान व स्मृति मे लिखे थे जो आज भी लोग गुन गुनाते रहते हे)
उसके अतिरिक्त उपदेश परक गीत
पल पल बीते उमरिया मस्त जवानी जाए
मेरे मित्रो फूट को विदा कर दिजीये अब प्रेम किजीये
छोड़ सुन्दर भवन प्यारा परिवार धन मित्र जाना पड़े!
स्वप्न संसार हे रहना दिन चार हे मान करना नही
एसे करीब सात सौ गीत उन्होंने लिखे जो आज भी गाए जाते हे !
उपाध्याय पद – उपाध्याय श्री कस्तुर चंद जी म.सा के देवलोक गमन होने के पश्चात सन 1986 में आचार्य सम्राट आनंद रीषी जी म.सा ने उपाध्याय पद से विभूषित किया अप्रेल 86 में उपाध्याय पद समारोह का आयोजन किया अपने गुरुदेव की तरह कभी पद की चाह नही की ! उपाध्याय पद भी आचार्य श्री आनन्द ऋषी जी म.सा के आदेश व अन्य सन्त – सतीयो के अत्यधिक आग्रह एवम गुरु भक्तो की विनती पर उन्होने स्वीकार किया !
संस्थाओ के लिये प्रेरणा – उन्होने कई संस्थाओ के लिए प्रेरणा दी जिसमें जैन दिवाकर छात्रावास नीमच, जैन दिवाकर विद्यानिकेतन इन्दोर, महावीर कालेज बेंगलोर आदि कई संस्थाए आज कार्य कर रही है ! जिसमें उनकी प्रेरणा से स्थापित बेंगलोर की शिक्षण संस्थाए जीसमें महावीर कालेज प्रमुख रूप से विशिष्ठ पहचान बनाये हुए हे ! उनका मुख्य उपदेश शिक्षा का प्रचार व दान रहा साधार्मिक सहायता के लिए उन्होंने विशेष प्रेरणा दी । आपने72 वर्षावास किये प्रथम घाणेराव सादड़ी व अन्तिम अलसूर ( बेंगलोर) में किया संवत 2051 की वेशाख शुक्ला दसम को शूले( बेगलोर) में देवलोक गमन हुआ।
एसे महान संत के 98 वें दीक्षा जयन्ती पर हार्दिक भाव सुमन। मेरे उपर उनकी बहुत कृपा रही , यह धार्मिक व सामाजिक कार्यो की प्रेरणा उन्होंने ही दी।
आप जहा भी विराजमान हे कृपा बरसती रहे ।