संकलनकर्ता – शैलेन्द्र कुमार जैन, इन्दौर
- क्रोध गुण नहीं अपितु ऐसा अवगुण है जो समस्त गुणों को गौण कर देता है।
- क्रोध को दोस्त बनाने की बजाय जमीनदोस्त कर दो।
- क्रोध सत्, संत और सत्य से दूर रखता है।
- क्रोध जीवन को अनुपयोगी, जीव को दुरूपयोगी और साधु को अयोगी बना देता है।
- क्रोध स्वभाव, प्रभाव, सद्भाव और परमभाव को नष्ट कर देता है।
- क्रोध संतभाव, समभाव और सिद्धभाव को उत्पन्न नहीं होने देता।
- क्रोधी के जीवन में संत और बसंत का प्रवेश निषिद्ध है।
- क्रोध शम, प्रशम और उपशम अध्यवसाय की साधना में बाधा उत्पन्न करता है।
- क्रोधी को मैत्री, मित्र और मंत्र, तीनों फलीभूत नहीं होते।
- क्रोधी के साथ न कोई मंत्रणा करता है, न कोई आमंत्रित करता है।