जैन दिवाकर श्री चौथमल जी महाराज की अनुपम देन, ग्रन्थ निग्रन्थ-प्रवचन

विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा( पूणे)
उपाध्यक्ष अ. भा. श्वे. स्था. जैन कांफ्रेंस, ज्ञान प्रकाश योजना
मंत्री : जैन दिवाकर साहित्य प्रकाशन समिती चितौड़ गढ़( राज.)

जगत् वल्लभ, जैन दिवाकर, प्रसिद्ध वक्ता, भारत भूषण, श्री चौथमल जी महाराज एक क्रान्तदर्शी शताब्दी सन्त थे! वह एक सुप्रसिद्ध वक्ता के साथ ही मंजे हुए साहित्य सर्जक एवम आशु कवि थे! उन्होने भारतीय तथा विदेशी धर्म-दर्शनो का तल स्पर्शी अध्ययन किया था! उनका ज्ञान गम्भीर तथा अनुभव परिपक्व और व्यक्तित्व एवम कृतित्व इतना आकर्षक और महान था कि कोइ भी व्यक्ति उनकी ओर खींचा चला जाता था ।
श्री जैन दिवाकर जी म. महाराज बहु भाषा विद् थे! तत्कालीन राग- रागणीयो तथा छन्द , रस, अलंकार एवम व्याकरण के अच्छे ज्ञाता थे । व्यसन मुक्ति एवम जीवदया उनके मिशन थे! इस मिशन की पूर्ति तथा व्यापकता के लिये मुनि श्री ने हजारो की संख्या में पदों, स्तवनो, लावणीयों, महापुरुषो के चरित्रो, गजलों आदि की रचना की । बहुत से जैन व जैनेतर विद्वान, सन्त व सतीयें उनसे मिलते व आग्रह कर विनती कर कहते कि गीता , धम्मपद, कुरान , बाइबल, की तरह ही जैन धर्म-दर्शन के सिद्धान्तो विषयक एक ग्रन्थ की रचना आप द्वारा की जाये। श्वेत. स्था. जैन कांफ्रेस का प्रतिनिधी मंडल मिला।
एक बार किसी गहन विषय के लिए विचार विमर्श करने के लिये , श्वे. स्था. जैन कांफ्रे स का प्रतिनिधी मंडल मुनि जैन दिवाकर जी म.सा के पास आया था वंहा चर्चा के दौरान प्रतिनिधी मंडल ने कहा कि गुरुदेव जब कोई अन्य धर्मविलम्बियो से बात होती हे तो वह यह कहते है कि हर धर्म का कोइ न कोई प्रतिनिधी ग्रन्थ हे पर आपका प्रतिनिधि ग्रन्थ कोन सा हे हम निरुत्तर हो जाते है । इस समय आप ऐसे महापुरुष हे जो यह कार्य आप कर सकते है ।
( यह बात उपाध्याय पूज्य गुरुदेव श्री मूल मूनि जी म.सा ने बताइ)
गुरुदेव का निश्चय
मुनि श्री ने सोचा कि कितनी ही बार यह मांग उठी है अतः आग्रह स्वीकार कर के आगम ग्रन्थो( जैन सूत्रो) के सिद्धान्तानुसार विभिन्न गाथाओं का चयन कर भगवत् – गीता की तर्ज पर अठारह अध्यायो में निग्रन्थ- प्रवचन का संकलन सम्पादन कर एक महत्वपूर्ण, आदर्श एवम एतिहासिक कार्य किया है। निग्रन्थ प्रवचन ग्रन्थ जैन धर्म – दर्शन के सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक उत्कृष्ठ ग्रन्थ है।
संस्कृत में काव्यबद्ध अनुवाद एवं हिन्दी भाषा में गाथाओं का सरल भावार्थ
जैन आगम प्राकृत( अर्ध- मागधी) भाषा में है । मुनि श्री ने गाथाओं का संस्कृत भाषा में काव्य बद्ध अनुवाद किया तथा हिन्दी भाषा में गाथाओं के नीचे सरल भावार्थ भी लिखा । आगमों में गाथाए सूत्र रुप में होने से उनमें गहरे भाव निहित होते है । उन भावो को स्पष्ठ करने की दृष्ठी से प्रमुख विद्वान प. शोभा चन्द्र भारिल्ल एवम जैन दिवाकर जी के प्रधान शिष्य उपाध्याय – गणी श्री प्यार चंद जी म.सा. ने भाष्य लिख कर विस्तार से सरल हिन्दी भाषा में विवेचन करते हुए विश्लेषण किया! भाष्य का सम्पादन भी उपाध्याय- गणी जी ने ही किया ।
निग्रन्थ प्रवचन के महातम्य का जहा तक संबध है, इस ग्रन्थ से प्रेरित होकर कुछ विद्वानो ने इसकी तर्ज पर अपने अपने तरीको से आगमों से गाथाएं चुन कर, सम्पादित ग्रन्थो के प्रकाशन भी किये किन्तु निग्रन्थ प्रवचन एक एसा ग्रन्थ है जिसकी महत्ता उन ग्रन्थो के समक्ष किसी भी प्रकार से कम नहीं आंकी जा सकती ! जैन धर्म-दर्शन के एसे कई ग्रन्थो में यह एक प्रतिनिधी ग्रन्थ हे जिसकी असम्प्रदायिकता एवम महत्ता की शताधिक जैन- जैनेतर विद्वानो द्वारा राष्ट्रीय स्तर के अनेक पत्रो ने मुक्त कंठ से सराहना की हे ।
निग्रन्थ प्रवचन की प्रकृति जीवन को उन्नत बनाने की हे! यह ग्रन्थ एक एसा प्रकाश ग्रन्थ हे जिससे जीवन जीने का प्रत्येक पहलू आलोकित होता है ।
अधम से अधम व्यक्ति भी इस ग्रन्थ की शिक्षा को धारण करे तो निश्चय ही वह संसार में रहते हुए सम्मान तो प्राप्त करता ही हे अन्त में सभी कर्म बंधनो से मुक्त होकर परमपद का भागीदार बनता है ।
( जैन दिवाकर ज्योति पूंज के संयोजन सम्पादक श्री विपिन जी जारोली के सम्पादकीय के आधार पर) निग्रन्थ प्रवचन के बारे में ओर जानकारी अगले आलेख में

Play sound