सीतामऊ (नयन जैन) । सीतामऊ नगर की पावन एवं धन्य धरा पर आजाद चौक स्थित आराधना भवन में चातुर्मास हेतु विराजित परम पूज्य साध्वी श्री रत्नरिद्धि श्रीजी म.सा. एवं साध्वी श्री रत्नवृद्धि श्रीजी म.सा. के सान्निध्य में प्रतिदिन ज्ञान, धर्म और अध्यात्म की अविरल ज्ञानगंगा प्रवाहित हो रही है। चातुर्मास के अंतर्गत रविवार को आयोजित विशेष धर्मसभा में परम पूज्य साध्वी श्री रत्नरिद्धि श्रीजी म.सा. ने “हमारी आत्मा के आतंकवादी कर्म” विषय पर अत्यंत प्रभावशाली एवं चिंतनशील प्रवचन प्रदान किए। अपने उद्बोधन में साध्वीश्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में कर्मों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। कर्म न तो किसी के साथ पक्षपात करते हैं और न ही किसी को बिना कारण फल प्रदान करते हैं।
उन्होंने कहा कि “कर्म श्योर हैं, साइलेंट हैं और स्मार्ट हैं।” अर्थात कर्म निश्चित रूप से अपना प्रभाव दिखाते हैं, बिना शोर किए अपना कार्य करते हैं और उचित समय पर सटीक परिणाम प्रदान करते हैं।
साध्वीश्री ने कर्म सिद्धांत को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए कहा कि हमारे द्वारा किए गए प्रत्येक कर्म मानो एक लिफाफे में बंद होकर हमारे पास ही लौटते हैं। चाहे कर्म अच्छे हों या बुरे, वे कभी नष्ट नहीं होते बल्कि समय आने पर ब्याज सहित वापस लौटते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने विचारों, वचनों और आचरण की शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
प्रवचन के दौरान साध्वीश्री ने वाणी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य को इतना मधुर बोलना चाहिए कि उसके अंतिम समय तक और उसके मरणोपरांत भी लोग उसकी बातों को स्नेहपूर्वक याद रखें। कटु वचन संबंधों को तोड़ते हैं जबकि मधुर वाणी हृदयों को जोड़ने का कार्य करती है।
उन्होंने आगे कहा कि यदि कर्म बंध गए हैं तो उनका उदय अवश्य होगा। इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने उदाहरण दिया कि जैसे दूध बिना दही नहीं जम सकता और सूर्य होने पर उसकी किरणों का ताप मिलना निश्चित है, उसी प्रकार बंधे हुए कर्मों का फल भी निश्चित रूप से प्राप्त होता है। कर्मों के नियम में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होता।
साध्वीश्री ने चेतावनी देते हुए कहा कि जैसे एक छोटी-सी चिंगारी पूरे कचरे के ढेर को जला सकती है, वैसे ही एक गलत कर्म मनुष्य के संचित पुण्यों को क्षीण करने की क्षमता रखता है। इसलिए जीवन में प्रत्येक कदम सोच-समझकर उठाना चाहिए और धर्म, संयम तथा सदाचार का मार्ग अपनाना चाहिए।
प्रवचन के अंत में उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि जीवन में आने वाली परिस्थितियों को हमेशा बदला नहीं जा सकता, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति अपने दृष्टिकोण को अवश्य बदला जा सकता है। यदि व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक विचार रखता है तो वह जीवन को सुखमय और सार्थक बना सकता है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे तथा सभी ने साध्वीश्री के प्रेरणादायी प्रवचनों का लाभ प्राप्त कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
आज से प्रारंभ होगी अनेक तपस्याएं
साध्वीश्री के पावन सान्निध्य में धर्म आराधना का क्रम निरंतर जारी है। इसी कड़ी में श्रद्धालुओं के आध्यात्मिक उत्थान एवं आत्मशुद्धि के उद्देश्य से आज से एक विशेष तपस्या का शुभारंभ किया जा रहा है। इस विशेष तपस्या के अंतर्गत साधकगण एक दिन उपवास एवं एक दिन बियासना का क्रम अपनाएंगे। तपस्या का यह क्रम संयम, त्याग, आत्मअनुशासन एवं धर्म आराधना की भावना को सुदृढ़ करने वाला रहेगा। तपस्वी निर्धारित नियमों के अनुसार तप आराधना कर धर्मलाभ प्राप्त करेंगे। संघ द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार इस तपस्या में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं के लिए बियासने की संपूर्ण व्यवस्था श्रीसंघ द्वारा की जाएगी, जिससे अधिक से अधिक धर्मप्रेमी इस पुण्य आराधना से जुड़ सकें। तपस्या के माध्यम से साधक आत्मकल्याण, कर्म निर्जरा एवं आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में विशेष प्रयास करेंगे। चातुर्मास के दौरान चल रही विभिन्न धार्मिक गतिविधियों एवं तप आराधनाओं से पूरे नगर में धर्ममय वातावरण निर्मित हो रहा है। श्रीसंघ ने सभी श्रावक-श्राविकाओं से अधिकाधिक संख्या में इस विशेष तपस्या में सहभागी बनकर धर्मलाभ लेने का अनुरोध किया है।