धर्म स्व प्रेरित होता है, पर प्रेरित नहीं-प्रवर्तकश्री

रतलाम,17 अप्रैल। श्रमण संघीय प्रवर्तक श्री प्रकाश मुनिजी मसा ने कहा कि स्व का अर्थ शरीर से भी होता है और आत्मा से भी है। इसे देखो तो आत्मा और कर लो तो शरीर है। विडंबना है कि संसार के लोगों ने शरीर को आत्मा और आत्मा को शरीर मान लिया है। साधु पक्का स्वार्थी होता है, क्योंकि वह सदैव स्व में रमण करता रहता है। उसे दुनिया से कोई मतलब नहीं रहता है।
नोलाईपुरा स्थित श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल स्थानक में प्रवचन देते हुए प्रवर्तकश्री ने स्वार्थ गौणता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि धर्म वही है, जो स्व प्र्रेरित होता है। पर प्रेरणा से होने वाला धर्म नहीं होता। वर्तमान मंे लोग दुनिया के प्रपंचों में पढकर दूसरों को खुश करने में जीवन खत्म कर देते है और खुद कंगाल हो जाते है। यदि आत्म कल्याण करना है, तो स्व को देखो और तप-आराधना कर प्रभुत्व को प्राप्त करने का प्रयास करो।
अभिग्रहधारी श्री राजेशमुनिजी मसा ने इससे पूर्व तप आराधना के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संसार के सुख क्रोध और लोभ बढाते है। क्रोध और लोभ इच्छा पर निर्भर है, यदि इच्छा पूरी होती है, तो लोभ बढता है और इच्छा पूरी नहीं होती, तो क्रोध बढता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और माया जैसे अवगुणों से मुक्त होना है, तो इसी भव में तप आराधना कर शरीर को पवित्र करना चाहिए। वर्षीतप और अन्य तप आराधनाएं इसी क्रम में हो रहे है।
प्रवचन में श्री दर्शनमुनिजी मसा ने भी विचार रखे। इस दौरान पूज्य श्री अभिनंदन मुनि जी मसा एवं पूज्या श्री चंदनबाला जी मसा, महासती श्री रमणीक कुँवर जी मसा, पूज्या श्री कल्पना जी मसा पूज्या श्री चंदना जी मसा, पूज्या श्री लाभोदया जी मसा, पूज्या श्री जिज्ञासा जी मसा आदि ठाणा उपस्थित रहे। संचालन रखब चत्तर ने किया। अंत में रचना बहन-संदीप चोरड़िया के तपोत्सव के उपलक्ष्य में कांता बहन-माणकलाल चैरडिया परिवार द्वारा प्रभावना का वितरण किया गया।

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