पुण्य तिथी पर विशेष
प्रस्तुति: विजय कुमार लोढ़ा निम्बाहेड़ा( बेंगलुरु)
संक्षिप्त जीवन – वृत
निग्रन्थ श्रमण संस्कृति की उज्जवलतम एवम क्रान्तिकारी आचार्य परम्परा के जैनाचार्य, संयम सरोवर के राजहंस, श्रमण परम्परा के आसन्न उपकारी, श्रमण संस्कृति के सुरक्षा कवच प्रदाता, क्रान्तिकारी क्रियोद्धारक पूज्य आचार्य श्री हुकुम चंद जी म.सा एक एसे सन्त थे, जीनका जीवन निर्मल, निष्कलंक, निर्विवाद एवम समुज्जवल रहा है!
गच्छाधिपति पूज्य श्री हुकुम चंद जी म.सा का जन्म . शहर टोड़ा रायसिंह में चपलोत परिवार में हुआ आपके पिताजी का नाम श्री रतन चंद जी चपलोत तथा माता का नाम श्री मोतियादेवी था। एकबार पूज्य श्री लाल चंद जी म.सा का बुंदी पधारना हुआ , गृहकार्य निमित हुक्मी चंद जी का भी बुंदी आना हुआ पूज्य श्री लाल चंदजी म.सा के प्रवचन से वेराग्य उत्पन्न हुआ ओर संवत 1879 के – मार्गशीर्ष अष्ठमी के दिन को आपकी दीक्षा हुई।
दीक्षा लेने के बाद आपने आगमो का गहन अध्ययन किया आपकी प्रवचन शैली, आडम्बर रहित एवम सरल तथा वेराग्य से ओतप्रोत भव्य जीवो को हृदय को सीधे छूने वाली थी।
आपने 21 वर्ष तक बेले बेले का तप किया
आप कितनी ही भंयकर शीत हो ग्रीष्म रीतु एक ही चद्दर का उपयोग करते थे। आपने मिष्ठान व तली हुई चीजो का जीवन भर के लिए त्याग कर लिया था । केवल 13 द्रव्यो को रखकर बाकी सभी द्रव्यो का जीवन भर के लिए त्याग कर लिया था।
आप प्रतिदिन 2000 नमोत्थूणम( शक्रस्तव) का ध्यान जीवन पर्यन्त करते रहे। आपकी साधना इतनी उत्कृष्ठ थी कि आपके स्पर्श मात्र से रामपुरा के एक कुष्ठरोगी का कुष्ठ रोग मिट गया तथा एक वेरागीन बहीन की हथकड़ीया भी आपके दर्शन से टुट गइ ! आपके तपोबल से नाथद्वारा के व्याख्यान स्थल पर आकाश से रुपयो की बरसात हुई।
पूज्य श्री ने चतुर्विध संघ की साक्षी से शिव लाल जी म.सा को आचार्य पद पर प्रतिष्ठीत किया।
इस प्रकार 38 साल 5 माह का शुद्ध संयम पाल कर संवत 1917 की वैशाख शुक्ला पंचमी को आपका संथारा / समाधी पूर्वक ग्राम जावद में आपका देवलोक गमन हुआ। जैन दिवाकर जी म.सा ने पूज्य श्री पर एक छन्द की रचना की जिसमें लिखा है कि पुज्य श्री आउष्टक विमान में देवपने में उत्पन्न होकर महा विदेह क्षेत्रमें राज्यवंश में बलदेव की पदवी पाकर मोक्ष मे पधारेगें।
जैन दिवाकर जी म.सा ने परम्परा से सुना था कि पूज्य श्री के देवलोक गमन होने के बाद उनके पात्र पर स्वर्ण अक्षरो में यह सब अंकित हुआ था जो बाद मे मीट गया। एसे परम प्रतापी क्रियोद्धारक आचार्य श्री हुक्मी चंद जी म.सा के पुण्य स्मृति दिवस पर अनेक अनेक वंदन उनकी कृपा बनी रहे। पूज्य उपाध्याय श्री केवल मुनि जी म.सा भी श्रावक-श्राविकाओं को दैनिक पूज्य श्री हुक्मी चंद जी म.सा की माला गिनने को तथा उपाध्याय प्रवर श्री मूल मूनि जी म.सा जब भी बड़ी मंगलीक फरमाते थे तब गुरुदेव जैन दिवाकर जी म.सा द्वारा रचित पूज्य हुक्मी चंद जी म.सा का छन्द ही फरमाते थे । आज भी एसे कइ हजारो महानुभाव एवम माता बहिने है जो इस छन्द का हमेशा पाठ करते हैं । ऐसे महान आचार्य के चरणों में अनन्त वंदन श्रद्धावनत ।
विजय कुमार लोढ़ा, निम्बाहेड़ा( बेंगलोर )
उपाध्यक्ष: . अ. भा. श्वे. स्था. जैन कांफ्रेंस नइ दिल्ली ज्ञान प्रकाश योजना
मंत्री: श्री जैन दिवाकर साहित्य प्रकाशन समिती चितौड़गढ़ (रजिस्टर्ड)