रतलाम, 25 जुलाई। पूज्य प्रज्ञा निधि युगपुरूष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कहा कि संसार में दो प्रकार के मन होते है। एक साधन प्रेमी और दूसरे साधना प्रेमी। साधन प्रेमी खुद को मलीन बनाते है, जबकि साधना प्रेमी क्लीन बनते है। क्लीन बनना अथवा मलीन बनना? ये अपने हाथ में होता है। क्लीन बनने के लिए साधना प्रेमी होना आवश्यक है।
आचार्यश्री ने मंगलवार को सिलावटों का वास स्थित नवकार भवन में प्रवचन के दौरान दुर्मति के छटे दोष मलीनता की विवेचना करते हुए कहा कि साधन प्रेमी लोग मलीन से मलीन बन रहे है। महापुरूषों ने कहा है कि विकारी मन मलीन होता है, संस्कारी मन क्लीन होता है और सदाचारी मन विकारों का समाधान होता है। कोई भी व्यक्ति दो कारणों-विषयों के प्रति आसक्ति और प्राप्त वस्तुआंे के प्रति अहंकार से विकारी बनता है। शालीनता के लिए संस्कारी और सदाचारी बनना पडता है और इसके लिए साधना आवश्यक है।
आचार्यश्री ने कहा कि मलीनता का संबंध वैचारिकता से है। वह कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। इस संबंध को तोडने के लिए साधना का मार्ग उत्तम हैं। साधना अतीत, वर्तमान और भविष्य सबके लिए की जा सकती है। अतीत के लिए पश्चाताप, वर्तमान के लिए समभाव और भविष्य के लिए संकल्प इन तीन विकल्पांे का जीवन में अनुसरण ही जीवन में मलीनता का समाधान है। उन्होंने कहा कि साधना की पहली शर्त सावधानी है। सावधानी हटी, तो दुर्घटना घटी का जुमला इसीलिए चलन में है। दूसरी शर्त संतुष्टि अर्थात जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है का सिद्धांत अपनाना चाहिए। तीसरी शर्त समाधि होती है, जो सावधानी और संतुष्टि होने पर अपने आप आ जाती है।
आरंभ में उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन करते हुए जीव मैत्री, जिन भक्ति और जीवन पूर्ति पर प्रकाश डाला। अंत में आदर्श संयमरत्न श्री विशालप्रिय मुनिजी मसा ने प्रवचनों पर आधारित रोचक प्रश्न किए। संचालन हर्षित कांठेड द्वारा किया गया।
युगप्रभजी मसा के 33 उपवास
आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा की प्रेरणा से अभ्युदय चातुर्मास में तपस्या का क्रम निरंतर जारी है। मंगलवार को तरूण तपस्वी श्री युगप्रभजी मसा ने 33 उपवास की दीर्घ तपस्या पूर्ण की। सेवानिष्ठ, एकान्तर तप के तपस्वी श्री जयमंगल मुनिजी मसा ने 27 उपवास और विद्यावाग्नी महासती श्री गुप्तिजी मसा ने 24 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। तपस्विनी, सेवागुण संपन्न महासती श्री निरूपणाश्री मसा की भी 15 उपवास की तपस्या चल रही है। कई श्रावक-श्राविकाएं ने भी तप आराधना के प्रत्याखान लिए।