सुख में हमेशा सावधान रहें और दुख में ढूंढे समाधान- आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

रतलाम, 31 जुलाई। सुख मिलने पर कभी इतराना नहीं चाहिए, अपितु हमेशा सावधान रहना चाहिए। वरना वह आपको दुर्गति की ओर ले जाएगा। साधु जैसे हमेशा सावधान रहता है, वैसे रहो। दुख जब आता है और आपको समाधान नहीं मिलता, तो वह और बढ़ जाता है। इसलिए चाहे जितना दुख हो, हमें उसका समाधान तलाशना चाहिए। सुख को कभी दिखाना नहीं चाहिए, क्योंकि वह एक दिन टूटेगा और दुख मेहमान की तरह है ,जो एक ना एक दिन अवश्य जाएगा। इसलिए सुख में हमेशा सावधान रहें, दुख में समाधान ढूंढे और धर्म में परिधान याने मुक्ति को तलाशें|
यह उद्गार आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में सोमवार को प्रवचन में कहे। उन्होने कहा कि दुख आए तो सोचना मैं दिवालिया हूं, कुछ कर्जा कम हो गया। जीवन में दुख आना पार्ट ऑफ लाइफ है, लेकिन उसमें मन का संतुलन बनाए रखना आर्ट ऑफ लाइफ है। यदि भगवान ने आपको सुख दिया है और आपने उसका आनंद नहीं लिया तो चलेगा, लेकिन जब दुख आएगा तो उसे भोगना ही पड़ेगा। दुख समाधान तलाशने से कम होता है।
आचार्य श्री ने कहा कि कर्म सत्ता अगर दुख देती है तो उससे इंकार नहीं कर सकते हो, दुख के बीच में केवल एक सुख खोज लो तो आप परेशान नहीं होगे। बिना कर्म किए मतलब के सूत्र बोलने का अधिकार नहीं है। जिस तरह दवा में कैप्सूल के अंदर के पाउडर का महत्व रहता है, ठीक उसी प्रकार सूत्र का महत्व है। यदि सूत्र का मतलब आपको नहीं पता है तो ठीक वैसा होगा जैसे बिना पाउडर के दवा का खाली कैप्सूल। जो आपकी सेहत पर कोई प्रभाव नहीं डालेगा। ठीक वैसे ही यदि आपने बिना जानकारी के कोई मंत्र पढ़ लिया तो उसका कोई आध्यात्मिक प्रभाव नहीं होगा।
आचार्य श्री ने कहा कि सूत्र जीरो के समान है, जिसका कोई महत्व नहीं है। अर्थ अंक के समान है, यदि वह किसी जीरो के आगे लग गया तो उसकी वैल्यू कई गुना बढ़ा देगा। इसीलिए अर्थ के साथ सूत्र बोलना चाहिए। आचार्य श्री ने निधान को बंधन और परिधान को मुक्ति बताते हुए कहा कि निधान पदार्थ है और परिधान को परमात्मा चाहिए। निधान यानी कॉन्ट्रैक्ट और परिधान यानी कांटेक्ट। हमे निधान कभी नहीं करना चाहिए, हमेशा परिधान करना चाहिए । इस दौरान श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।