

रतलाम, 2 अगस्त। दुनिया उल्टी है, जो न कहो वह करती है और जो कहते वह नहीं करती। उपदेश सुनकर जो मार्ग पर आए वह उत्तम है। संदेश सुनकर मार्ग पर आए वह मध्यम, आदेश सुनकर मार्ग पर आए वह अधम और आदेश सुन कर भी जो ना आए वह अधधम होते है। प्रभु ने तीन डिवाइन संदेश गलत याद बंद करो, गलत वाद बंद करो और गलत स्वाद बंद करने के दिए है।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टॉकीज में बुधवार को प्रवचन में कही। उन्होंने कहा कि किसी की गलती, भूल, अपराध, अपमान भूल जाओ। अध्यात्म में जो भूल जाएगा वह बलवान है। दूसरों की गलती हम संग्रहित कर के बैठे हैं। बोलने को राजी नहीं है। पानी में रहा हुआ कचरा समय आने पर बैठ जाएगा, लेकिन मन में संग्रह किया कचरा कभी नीचे नहीं बैठेगा, वह आपको दुर्गति की ओर ले जाएगा। जीवन बदला लेने के लिए नहीं बलिदान देने के लिए मिला है।
आचार्य श्री ने कहा कि आहार की भूल से हमारा शरीर खराब होता है। वाणी की भूल से हमारा संबंध खराब होता है। खाना अगर गलत खाया तो हॉस्पिटल और बोलना नहीं आया तो कोर्ट जाना पड़ेगा। बाजारू चीजों से परहेज करना चाहिए, बाएं से दाएं नहीं करना चाहिए। जहां से लिया है, वहीं से उतारो वरना स्वाद नहीं आएगा। पांच इंद्रियों में सबसे कठिन स्वाद की इंद्री है। जो उस पर काबू पा लेता है उसका कल्याण हो जाता है। अगर इन तीनों की भूमिका बन गई तो आत्म कल्याण होगा।
आचार्य श्री ने व्यक्ति को धर्म के प्रति जोड़ने के तीन मार्ग आदेश, संदेश और उपदेश बताए। उन्होने कहा कि संतों की भाषा आदेश की नहीं, उपदेश की होती है। प्रभु संदेश देते हैं कि कल्याण चाहते हो तो मेरे मार्ग पर चलो। साधु-भगवन जो हमें उपदेश देते हैं। आत्मीयता की भाषा बोलो, योग्य को सिर्फ उपदेश देना पड़ता है, अयोग्य को आदेश की भाषा बोलनी पड़ती है। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के तत्वावधान में चल रहे प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।