- आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा ने कहा
- छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन
रतलाम,09 अगस्त। दुष्कर्म की घटनाएं मानव मन की विलासिता की प्रतीक है। विलासी रात या दिन नहीं देखता, अपितु कामातुर रहता है। वह अपनी इज्जत, सम्मान और स्वाभिमान सबकों विस्मृत कर देता है। दशानन रावण की बीस आंखे थी, लेकिन नजर एक औरत पर थी और आज दो आंख वालों की नजर हर औरत पर है। मुंह में राम और मन मंे काम, ये दुविधा नहीं चलेगी। विलासिता की नींव भोगों पर टिकी है। भोग छोडोगे, तो विलासिता अपने आप छूट जाएगी।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। छोटू भाई की बगीची में चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान विलासिता के दोष से बचने का आव्हान करते हुए उन्हांेने कहा कि भोगों को अनंत दुखों की खान बताया गया है, इसीलिए ज्ञानी हमेशा भोग का त्याग कर देते है। दुर्मति से मनुष्य विलासी या विकारी बन जाता है और विकारी को भिखारी बनते देर नहीं लगती। मनुष्य के मन में जब संस्कारी और सदाचारी होने का भाव रहेगा, तभी विकारों से मुक्त हो सकेगा।
आचार्यश्री ने कहा कि विलासिता की गोद में मरने वाला उस कीडे जैसा है, जो अशुद्धि में पैदा होता है और अशुद्धि में ही मर जाता है। विलासिता तन को शक्ति विहिन बना देती है। मन को भक्तिहीन बना देती है और जीवन को विरक्ति विहिन बना देती है। जहां भी विलासिता का उल्लास होता है, वहां सभी सदगुणों का विनाश होता है। इससे परिवार के परिवार खत्म हो जाते है। स्वामी विवेकानंद ने भारत को चरित्र से महान कहा था, लेकिन आज स्थिति विकट हो रही है। पाश्चात्य देशों में संत-मुनि नहीं है, लेकिन भारत तो ऋषि-मुनियों का देश है, फिर भी यहां विलासिता हमारा सर्वनाश करने वाली बन रही है।
आचार्यश्री ने कहा कि विलासिता का त्याग संकल्प शक्ति से ही हो सकता है। इस दोष से हमे दूसरों को नहीं, अपितु अपने आप को बचाना है। केरेक्टर ही केरियर बनाता है, लेकिन आज विद्यार्थी सिर्फ केरियर की चिंता कर रहे है। नेपोलियन को उसके केरेक्टर ने फ्रांस का सर्वेसर्वा बनाया था। चरित्र से देश बनता है और बच्चों में यदि चरित्र का निर्माण नहीं होगा, तो देश नहीं बचेगा। आरंभ में उपाध्याय प्रवर, प्रज्ञारत्न श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन करते हुए हर प्रकार की हिंसा से बचने का आव्हान किया। उन्हांेने कहा कि जीवन में विवेक का जीव सदैव जागृत रहेगा, तो मनुष्य हर प्रकार की विराधना से बच जाएगा। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी भाव व्यक्त किए। इस दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकागण मौजूद रहे।