मुनि धर्म की कठिन साधना और श्रावक धर्म की सरल राह से प्रशस्त होता है मोक्ष मार्ग – मुनि श्री प्रमाणसागर

रांची। झारखंड की राजधानी में इन दिनों बिरसा मुंडा पार्क मे पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महामहोत्सव मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज एवं मुनि श्री संधान सागर महाराज के स संघ सानिध्य में चल रहा है। पांचवे दिवस केवलज्ञान कल्याणक के अवसर पर समवसरण में गणधर पीठ से प्रवचन देते हुए मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि आत्मकल्याण और मोक्ष प्राप्ति के लिए प्रत्येक मनुष्य को मुनि धर्म का पालन करने का प्रयास करना चाहिए, जो व्यक्ति मुनि धर्म का पालन करने में असमर्थ हैं, उनके लिए जैन धर्म में श्रावक धर्म की सुव्यवस्थित परंपरा का विधान किया गया है।
मुनि श्री ने अपने उद्बोधन में बताया कि जैन मुनि 28 मूलगुणों का पालन करते हुए तेरह प्रकार के चारित्र को अंगीकार करते हैं। ये अट्ठाईस मूलगुण ही मुनिव्रत की आधारशिला हैं, जिनके बल पर मुनि कठोर साधना में स्थिर रहकर मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करते हैं तथा अपने चारित्र की दृढ़ता बनाए रखते हैं,उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति के लिए मुनि व्रत धारण करना संभव नहीं है, इसलिए गृहस्थों के लिए श्रावक धर्म का मार्ग बताया गया है। श्रावक धर्म को तीन प्रमुख श्रेणियों—पाक्षिक, नैष्ठिक और साधक—में विभाजित किया गया है।
पाक्षिक श्रावक वे होते हैं जो जिनमत में श्रद्धा रखते हुए कुलाचार का पालन करते हैं, देव-गुरु-धर्म की उपासना करते हैं तथा रात्रि भोजन का त्याग करते हैं। इसके बाद नैष्ठिक श्रावक अधिक निष्ठा के साथ धर्म का पालन करते हैं, जिनके जीवन में ग्यारह प्रतिमाओं का क्रमिक विकास होता है, जो आध्यात्मिक उन्नति की सीढ़ियाँ मानी जाती हैं। मुनि श्री ने कहा कि साधक श्रावक उच्च आध्यात्मिक स्तर पर पहुंचकर संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हो जाते हैं तथा पंच गुरु की शरण स्वीकार करते हैं। वे क्रमशः व्रतों और गुणों में वृद्धि करते हुए अंततः संलेखना (समाधि मरण) के माध्यम से शांतिपूर्वक देह का त्याग करते हैं,मुनि श्री ने कहा कि श्रावक अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार पाक्षिक से नैष्ठिक और आगे साधक अवस्था की ओर अग्रसर हो सकता है,जीवन भर कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए अंत में संलेखना द्वारा देह का परित्याग करना ही जीवन का वास्तविक सार है।
जैन धर्म की यह महान परंपरा स्पष्ट करती है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर धर्म का पालन करते हुए आत्मशुद्धि के मार्ग पर अग्रसर होकर मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।