

रतलाम, 9 अगस्त। अहंकारी तो फुटबाॅल की गेंद की तरह होता है, जिसमें हवा भर जाने पर वह लोगों के पांव के जूते खाती है। अहंकार में आकर व्यक्ति को तीन चीजों का मैं कौन हूं, सामने कौन है और परिणाम क्या आएगा यह पता ही नहीं चलता है। जीवन में कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि अहंकारी व्यक्ति फुल तो सकता है लेकिन फैल नहीं सकता।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में प्रवचन के दौरान कहीं। आचार्य श्री ने अंहकार को परिभाषित करते हुए कहा कि रावण को अंहकार इतना था कि उसको पता ही नहीं चला कि मैं कौन हूं, मेरे सामने कौन है और उसका परिणाम क्या आएगा। बिना सोचे समझे अहंकार में उसने गलत कदम उठाया और उसका परिणाम भी भोगना पड़ा।
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में आप चाहे कितनी ही ऊंचाई पर क्यो न पहुंच जाओं लेकिन अपनी मर्यादा को कभी मत लांघना। अहंकार में आकर कभी किसी को दुख, दर्द और तकलीफ मत देना कि किसी के मन का आघात पहुंचे। यदि किसी के मन को ठेस पहुंचती है तो परमात्मा भी आपको माफ नहीं करेगा। जीवन में आप सब कुछ करो लेकिन अहंकार कभी मत करो। अहंकार व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।
श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के तत्वावधान में सैलाना वालों की हवेली मोहन टाॅकीज में चल रहे प्रवचन के दौरान श्री संघ के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।